कुर्मियों की बातें : समाज के हीरा हैं डॉ. जवाहर सिंह
Mon, Dec 1, 2025
राजेश पटेल, नरायनपुर/मिर्जापुर ।
चुनार क्या, पूरे जिले में डॉ. जवाहर सिंह को कौन नहीं जानता होगा। शख्सियत ही ऐसी है। प्रख्यात चिकित्सक के साथ समाजसेवी। समाजसेवा आयकर बचाने के लिए नहीं, उद्देश्य सिर्फ जरूरतमंदों की सेवा है।
डॉ. सिंह 90 वर्ष की दहलीज पर हैं, लेकिन आज भी उसी भाव से मरीजों के साथ समाज की सेवा में जुटे हैं। इनके बारे में जानना जरूरी है।
डॉ. जवाहर सिंह का जन्म 15 दिसंबर 1936 को हुआ था। वर्ष 1960 में बीएचयू से एबीएमएस की डिग्री ली। उस समय चाहते तो आसानी से सरकारी डॉक्टर बन जाते, लेकिन गांव में रहकर ग्रामीणों की सेवा को उन्होंने प्राथमिकता दी। नरायनपुर में प्रैक्टिस शुरू कर दी।
नरायनपुर बाजार चुनार तहसील में ही पड़ता है। यह क्षेत्र के मध्य में पड़ता है। यहां से अहरौरा, मिर्जापुर व बनारस आना-जाना आसान है। अहरौरा रोड रेलवे स्टेशन भी था। रेलवे स्टेशन तो अब भी है, लेकिन लोगों की मांग पर इसका नाम बदलकर अब नरायनपुर बाजार कर दिया गया है। नाम बदलवाने में मिर्जापुर की सांसद अनुप्रिया पटेल ने काफी प्रयास किया, जो सफल रहा।
नरायनपुर में रहकर भी अपने गांव के बारे में सोचते रहते थे। उनको लगा कि उनके गांव अधवार में पोस्ट ऑफिस न होने से लोगों को काफी दिक्कतें हो रही हैं। सो उन्होंने काफी प्रयास करके गांव में ही डाकखाना खोलवा दिया। इंटर कॉलेज अहरौरा और भुड़कुड़ा में था। दोनों उनके गांव अधवार से दूर थे। लिहाजा गांव व क्षेत्र के संभ्रांत लोगों के साथ बैठकर गांव में ही इंटर कॉलेज की स्थापना का प्रस्ताव रखा। सभी ने सहयोग का वादा किया।
डॉ. जवाहर सिंह की अगुवाई में अधवार में 1964 में इंटर कॉलेज खुल गया। उसका नाम सर्वोदय इंटर कॉलेज रखा गया। इस विद्यालय के प्रबंधक के रूप में उन्होंने 18 साल तक इसके विकास का कार्य किया। इतना ही नहींं, अहरौरा में वनस्थली महाविद्यालय की स्थापना में भी अहम भूमिका निभाई। इसीलिए वह इस महाविद्यालय के उपाध्यक्ष भी रहे।
राष्ट्रीय इंटर कॉलेज शेरपुर तथा राम प्रसाद बालिका इंटर कॉलेज शेरपुर की प्रबंध समिति के अध्यक्ष के रूप में वर्षों तक शिक्षा के इन मंदिरों के विकास का कार्य किया। इसके अलावा भारत विकास परिषद सहित कई स्वयंसेवी संस्थाओं के पदाधिकारी रहे।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय में पढ़ते समय दौड़ में ऐसा रिकॉर्ड बना दिया, जो करीब 15 साल तक नहीं टूटा था। 1500 मीटर दौड़ में वह विजेता बने थे। करीब 90 साल की उम्र हो गई है, लेकिन डॉ. साहब पर यह उम्र हावी नहीं हो सकी है। इसका मुख्य कारण उनका समय प्रबंधन व उचित आहार-विहार है।
आज भी वह सुबह चार बजे बिस्तर छोड़ देते हैं। सर्दी, गर्मी या बरसात हो, वह पांच बजे सुबह तक स्नान कर ही लेते हैं। मॉर्निंग वाक का सिलिसला कभी टूटा नहीं। बाहर जाने में दिक्कत होती है तो घर के गलियारे में ही टहल लेते हैं। डॉ. जवाहर सिंह पहले नियमित एक घंटा बागवानी को देते थे। इसके बावजूद समय से ठीक नौ बजे क्लीनिक में आकर बैठ जाते थे। अब भी बैठ जाते हैं।
सुबह नौ बजे से 11 बजे तक तथा शाम को तीन बजे से छह बजे तक वह क्लीनिक में रहते हैं। समय के पाबंद इतने कि यदि कहीं 11 बजे पहुंचना है तो वह आज भी पांच मिनट पहले ही पहुंच जाते हैं। व्यवहार कुशल व मृदुभाषी डॉ. जवाहर सिंह ने 25 साल तक अपने यहां निःशुल्क नेत्र ऑपरेशन शिविर लगवाया है।
इस शिविर के माध्यम से हर वर्ष सौ से ज्यादा लोगों को ज्योति मिलती थी। इसमें वह किसी से कोई सहायता नहीं लेते थे। मरीजों के एक सप्ताह तक रहने, खाने, दवा आदि का खर्च खुद वहन करते थे। ऑपरेशन, चश्मा व हरी पट्टी के लिए भी कुछ नहीं लेते थे। पूरी तरह से फ्री। इसके अलावा भी वह किसी न किसी बहाने जरूरतमंदों की मदद आज भी करते रहते हैं।
आज की महंगाई में भी मरीजों को देखने की फीस मात्र 50 रुपये लेते हैं। किसी के पास यह भी नहीं है, तो कोई जबरदस्ती नहीं। उनकी ही परंपरा को उनके सुपुत्र डॉ. प्रवीण पटेल आगे बढ़ा रहे हैं। प्रवीण डेंटिस्ट हैं। पिता-पुत्र का क्लीनिक एक ही परिसर में है।
कुर्मियों की बातें : कुल्हाड़ियां चलती रहीं अपना दल के तने पर, फिर भी पौधा बन गया वटवृक्ष
Mon, Dec 1, 2025
राजेश पटेल, मिर्जापुर
किसी शायर ने लिखा है-
"आंधियों के इरादे अच्छे तो न थे, चिराग-ए-वतन फिर भी जलता रहा।"
यह शेर डॉ. सोनेलाल पटेल द्वारा रोपे गए पौधे
अपना दल
पर सटीक बैठ रहा है। उनके द्वारा रोपे गए अपना दल नामक इस पौधे को काटने के लिए न जाने कितनी कुल्हाड़ियां चलाई गईं। लेकिन यह हर कुल्हाड़ी के साथ और पुष्पित और पल्लवित होता गया। गैरों ने तो काटने की कोशिश की है, अपनों ने भी कम आरा नहीं चलाया है।
दरअसल उत्तर प्रदेश की राजनीति में कुर्मी जाति की धमक किसी को भी बर्दाश्त नहीं हो पा रही है। अगड़े तो दुश्मन समझ ही रहे हैं। पिछड़ों में यादव भी कुर्मियों को काटने की राजनीति ही करते चले आ रहे हैं। 1995 में डॉ. सोनेलाल पटेल ने 4 नवंबर को जब अपना दल की स्थापना की थी, तो लखनऊ के बेगम हजरत महल पार्क में देश भर से आए लाखों कुर्मी मौजूद थे। प्रदेश की राजधानी में कुर्मियों की इससे बड़ी जुटान न पहले हुई थी, न इसके बाद आज तक हो सकी।
सामाजिक न्याय की विचारधारा की मशाल को लेकर डॉ. सोनेलाल पटेल घूमते रहे। समाज को एकजुट करने का प्रयास करते रहे। सफलता का स्वाद पहली बार 2000 में मिला। जब प्रतापगढ़ सदर सीट के लिए हुए उपचुनाव में अपना दल के उम्मीदवार हाजी मुन्ना सलाम विधायक चुने गए। 2002 में जब आम चुनाव हुए तो अपना दल के तीन विधायक जीते। अपना दल के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष अतीक अहमद प्रयागराज शहर पश्चिमी से, अंसार अहमद नवाबगंज (अब फाफामऊ) तथा सुरेंद्र पटेल वाराणसी के गंगापुर (अब सेवापुरी) से जीते थे।
2000 में उपचुनाव में एक सीट तथा दो साल बाद 2002 में हुए आम चुनाव में तीन सीट जीतने से अपना दल कार्यकर्ताओं में खासा उत्साह था। किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत न मिलने के कारण राष्ट्रपति शासन लग गया। 56 दिन बाद भाजपा के समर्थन से बीएसपी सरकार बनाने में कामयाब हुई। मायावती मुख्यमंत्री बनीं। पर, यह सरकार ज्यादा दिनों तक चल नहीं सकी। बसपा को समर्थन देने के मुद्दे पर भाजपा में भी अंतरविरोध था। लिहाजा अगस्त 2003 में मायावती ने इस्तीफा दे दिया। अब 143 सीट जीतने वाले सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने अपनी सरकार बनाने के लिए जोड़-घटाव शुरू कर दिया।
बसपा के असंतुष्टों के एक गुट को तोड़ लिया। इसी क्रम में अपना दल के भी तीनों विधायकों को गुपचुप तरीके से अपने पाले में कर लिया। तीनों ने विश्वासमत के दौरान अपना मत मुलायम सिंह यादव के पक्ष में दे दिया। भाजपा ने भी सहयोग किया। लिहाजा मुख्यमंत्री तो मुलायम सिंह यादव बन गए, लेकिन अपना दल को खत्म करने की उनकी चाल को डॉ. सोनेलाल पटेल समझ गए थे। डॉ. पटेल ने अपने तीनों विधायकों को पार्टी से तत्काल निष्काषित कर दिया। कहा कि ऐसे लोगों के लिए उनकी पार्टी में कोई स्थान नहीं है।
इसके बाद एक अदद विधायक के लिए अपना दल को नौ साल तक इंतजार करना पड़ा था, जब उनकी बेटी अनुप्रिया पटेल 2012 में वाराणसी की रोहनिया सीट से विधायक चुनी गई। लेकिन, इस सफलता को देखने के लिए डॉ. सोनेलाल पटेल नहीं थे। उनका निधन 2009 में दीपावली के ही दिन 17 अक्टूबर को एक सड़क दुर्घटना में हो चुका था। डॉ. सोनेलाल पटेल ने अपने जीवन काल में 2007 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के साथ समझौता किया था। अपना दल के उम्मीदवार 38 सीटों पर थे। डॉ. सोनेलाल पटेल स्वयं दो स्थान प्रयागराज की सोरांव तथा वाराणसी की कोलसला विधानसभा सीट से चुनाव लड़े, लेकिन एक भी सीट पर विजय नहीं मिली।
इसका प्रमुख कारण भाजपा द्वारा इनको वोट न देना। जबकि डॉ. सोनेलाल पटेल के अनुयायियों ने भाजपा को जमकर वोट किया। 2012 में जब अपना दल के उम्मीदवार के रूप में उनकी तीसरे नंबर की बेटी अनुप्रिया पटेल ने रोहनिया सीट जीता तो पार्टी में उम्मीद फिर जिंदा हुई। 2014 में पार्टी ने भारतीय जनता पार्टी से समझौता किया। परिणाम अनुप्रिया पटेल मिर्जापुर से सांसद चुन ली गईं। अब जब पार्टी बढ़ने लगी तो जैसा आम तौर पर होता है, यहां भी पारिवारिकजन की महत्वाकांक्षाएं हिलोरें मारने लगीं। अपना दल की राष्ट्रीय अध्यक्ष अध्यक्ष कृष्णा पटेल ने अपनी बेटी अनुप्रिया पटेल को ही
पार्टी से निकाल दिया गया। अनुप्रिया से बड़ी बेटी डॉ. पल्लवी पटेल के साथ कृष्णा पटेल अपनी पार्टी अपना दल को आगे बढ़ाने का प्रयास करती रहीं। इधर निकाले जाने के बाद अनुप्रिया पटेल ने अपना दल सोनेलाल नाम से अपनी अलग पार्टी बना ली। इसके साथ अपना दल के नाम को लेकर चुनाव आयोग में आपत्ति भी कर दी। इसके कारण यह नाम सीज कर दिया गया। फिर कृष्णा पटेल ने अपना दल कमेरावादी नाम रखा। 2019 के लोकसभा चुनाव में कृष्णा पटेल ने खुद अपना दल को खत्म कर दिया। गोंडा से कांग्रेस के निशान पर चुनाव लड़ने की सहमति दे दी। चुनाव लड़ा भी। इसके बाद 2022 के विधानसभा चुनाव में उनके साथ राजनीति कर रहीं उनकी बेटी डॉ. पल्लवी पटेल ने भी समाजवादी पार्टी के चुनाव निशान साइकिल पर सवार हो गईं।
पल्लवी ने प्रदेश के उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य को भले इस चुनाव में हरा दिया, लेकिन एक बात तो साफ हो ही गई कि इन दोनों के लिए डॉ. साहब की विचारधारा कितनी मायने रखती है। सपा प्रमुख दिवंगत मुलायम सिंह यादव अपना दल को देखना ही नहीं चाहते थे। इनके लोग इसे वोटकटवा पार्टी भी कहते थे। 2003 में प्रयास किया। सोचा कि तीनों विधायकों को तोड़ लेंगे तो डॉ. सोनेलाल पटेल निराश होकर घर बैठ जाएंगे। लेकिन, डॉ. पटेल दूसरी ही मिट्टी के बने थे। वह हार मानने वाले कहां थे। फिर शून्य से ही चलना शुरू किया, लेकिन नियति को कुछ और मंजूर था। बीच सफर में ही वह दुनिया से रुखसत हो लिए।
अखिलेश यादव भलीभांति जानते हैं कि अनुप्रिया पटेल उनके झांसे में नहीं आने वाली हैं। तभी तो 2022 के चुनाव के पहले एक पत्रकार द्वारा अनुप्रिया पटेल को लेकर पूछे गए सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि उनके यहां हाउस फुल है। इसके बाद अपना दल की दूसरी शाखा अपना दल कमेरावादी की क्षत्रप डॉ. पल्लवी पटेल को लाल टोपी पहना दी। वह चाहते तो पल्लवी को कमेरावादी प्रत्याशी के रूप में ही लड़ा सकते थे। जैसे अनुप्रिया पटेल हैं। इनको लेकर भी खबरें आती ही रहती हैं कि भाजपा विलय के लिए दबाव बना रही है।
लेकिन अनुप्रिया का साफ कहना है कि वह किसी भी हाल में अपना दल सोनेलाल पार्टी का विलय किसी पार्टी में नहीं कर सकतीं। चुनाव में हार-जीत का कोई मायने नहीं। पिछड़ों, दलितों के मसीहा डॉ. सोनेलाल पटेल की विचारधारा जिंदा रहनी चाहिए। वह एमपी-एमएलए बनने के लिए नहीं, पिताजी की विचारधारा की लड़ाई लड़ रही हैं। इसके पहले 1999 में प्रयागगराज के पीडी टंडन पार्क मेंं तत्कालीन सरकार ने तो पिछड़ों, दलितों के इस मसीहा तो अपनी पुलिस द्वारा जान से मरवा ही देने की साजिश की थी, वह जो डॉ. सोनेलाल पटेल की जीवटता तथा लाखों का शुभचिंतकोंं, अनुयायियों की शुभकामनाओं का असर था वह जिंंदा बच गए थे।
कुर्मियों की बातें : जब यदुनाथ सिंह पटेल ने हाईकोर्ट की बेंच पर किया कब्जा
Mon, Dec 1, 2025
राजेश पटेल द्वारा लिखित पुस्तक 'तू जमाना बदल' से...
आजाद भारत के सबसे बड़े क्रांतिकारी श्रद्धेय यदुनाथ सिंह तब विधायक भी नहीं थे। बात वर्ष 1979 की है। वर्ष 1977 के आम चुनाव में मुगलसराय विधानसभा सीट से निर्दल ही मैदान में कूद पड़े थे। इसके पहले के आम चुनाव में भी मुगलसराय से ही निर्दल भाग्य आजमाया था। उस समय भी कम अंतर से हारे थे। वर्ष 1977 में भी जनता पार्टी की लहर के बावजूद यदुनाथ सिंह मात्र 1280 मतों के अंतर से हारे थे। विजयश्री जनता पार्टी के उम्मीदवार श्री गंजीप्रसाद यादव जी को मिली थी। यदुनाथ सिंह ने चुनाव परिणाम को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी।
तारीखों के बाद इस चुनाव याचिका को हाईकोर्ट ने खारिज कर दी। यदुनाथ सिंह ने साथियों से कहा कि न्यायपालिका में भी भ्रष्टाचार का घुन लग गया है। इसे ठीक करना ही होगा। उस दिन तो वे इलाहाबाद (अब प्रयागराज) से लौट आए, लेकिन कोलना निवासी सुशील बाबा (अब नहीं रहे), अदलहाट के शोभनाथ सिंह पटेल, मुगलसराय के आसपास के गांवों के निवासी मोहनलाल सोनकर, शकुंतलाल यादव और शमीम अहमद मिल्की, हरबंश सिंह सहित अन्य साथियों को साथ लेकर इलाहाबाद पहुंचे। अपने किसी काम से बाहर ही रह गए, लेकिन पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार शेष चारो साथी हाईकोर्ट की जिस बेंच ने इनकी याचिका को खारिज किया था, उसमें घुस गए।
राजेंद्र सिंह और रामआसरे सिंह बाहर ही थे। उस समय जस्टिस अमिताभ बनर्जी अपने चैंबर में थे। कोर्ट में जज की कुर्सी खाली थी, सो सुशील बाबा को उस पर आसीन करा दिया गया। शमीम अहमद मिल्की जनता के वकील बन गए। एक साथी पेशकार बन गया। इसी तरह से सरकार के वकील की भी भूमिका में एक साथी आ गए। करीब आधे घंटे तक हाईकोर्ट की इस बेंच पर इन लोगों का कब्जा रहा। अदालत की कार्यवाही समानांतर चलती रही। इसी बीच एक बार जस्टिस बनर्जी आए भी, लेकिन यहां का नाटकीय घटनाक्रम देखकर वे फिर अपने चैंबर में जाकर बैठ गए। उन्होंने पुलिस को सूचना भेजवाई। कुछ ही देर में कोर्ट परिसर में मौजूद अधिवक्ताओं के बीच यह खबर जंगल की आग की तरह फैल गई। यदुनाथ सिंह भी चूंकि परिसर में ही थे, सो वे भी भागकर आए। अधिवक्ता कक्ष में घुसना चाहते थे और यदुनाथ सिंह गेट पर दीवार की तरह खड़े हो गए। कहा कि खबरदार इधर जो आया। इसके बावदूद कुछ वकील जुटे और यदुनाथ सिंह व इनके साथियों पर हमला कर दिया। कुछ ही देर में पुलिस ने आकर सभी को हिरासत में ले लिया। जो साथी बाहर थे, वे खिसक लिए।
लिस ने एफआइआर दर्ज कर सभी को जेल भेज दिया। एक अधिवक्ता ने हाईकोर्ट की अवमानना का भी केस दायर कर दिया। इसकी सुनवाई जस्टिस जगमोहन सिन्हा व एक अन्य जज की संयुक्त बेंच में शुरू हुई। चूंकि मामला हाईकोर्ट की बेंच पर कब्जा का था, सो कोई भी वकील यदुनाथ सिंह व इनके साथियों की पैरवी करने के लिए तैयार नहीं हुआ। लिहाजा ये लोग खुद ही अपने समर्थन में बहस करते थे। इसी बीच शमीम अहमद मिल्की ने केस से जुड़े सभी दस्तावेजों की हिंदी में प्रतियों की मांग कर दी। लंबी बहस के बाद जस्टिस जगमोहन सिन्हा ने इनकी मांग को स्वीकार करते हुए हिंदी में प्रतियां उपलब्ध कराने के आदेश दिए। हालांकि इसमें समय लगा। बाद में अदालत की अवमानना के इस केस में यदुनाथ सिंह व इनके साथियों को तीन-तीन माह के सादे कारावास की सजा सुनाई गई थी, जिसे बनारस जेल में काटा भी।