कुर्मियों की बातें : बाबू प्रेम सिंह ने बाधाओं के जबड़े से छीन लिया था सपना
Mon, Dec 1, 2025
राजेश पटेल, जमालपुर।
इतिहास खुद लिखना होगा। वरना, आने वाली नस्लें हमें और हमारे पूर्वजों को याद नहीं रख पाएंगी। मिर्जापुर जनपद के चुनार तहसील में तमाम ऐसी विभूतियों ने जन्म लिया है, जिनके बारे में सुनने से प्रेरणा मिलती है। जीवन जीने का सलीका मालूम पड़ता है। गर्व की अनुभूति होती है।
आज बात जमालपुर विकास खंड के पिड़खिड़ गांव में 15 फरवरी 1926 को जन्मे बाबू प्रेम सिंह के बारे में। उनका जीवन जीने का तरीका अनुकरणीय रहा। साधारण परिवार से ताल्लुक रखते हुए भी खुद को खड़ा किया। सम्मान लायक बनाया। आदर्श जीवन के सिद्धांतों को आत्मसात किया। वैसे ही जिया भी। अब तो पिड़खिड़ से बनारस आना-जाना काफी आसान हो गया। आजादी के पहले न सड़क थी, न गंगा पर पुल। उस समय बनारस जाकर पढ़ना बहुत ही मुश्किल भरा काम था। इसके अलावा भी और बाधाएं थी, लेकिन प्रेम सिंह को कोई बाधा नहीं रोक सकी। उन्होंने बीएचयू से ग्रेजुएशन और एलएलबी की।
उनके विचार और कार्य में कोई अंतर नहीं था। तभी तो उनकी न जयंती है और न पुण्यतिथि। फिर भी याद करने को विवश हुआ। आपका जीवन संघर्ष एवं सामाजिक मूल्यों का मानदंड स्थापित करने के लिए समर्पित रहा। आप ग्राम पिड़खिड़, पोस्ट पिड़खिड़, तहसील चुनार, परगना भुइली, जिला मिर्जापुर उत्तर प्रदेश के मूल निवासी रहे। पिता विश्वनाथ सिंह ने पढ़ाई तो आठवीं तक ही की थी, लेकिन उर्दू भाषा पर उनकी अच्छी पकड़ रही।
प्राथमिक शिक्षा गांव की प्राथमिक पाठशाला से ग्रहण करने के बाद इंटरमीडिएट की पढ़ाई रामनगर वाराणसी से की। बीए एवं एलएलबी की शिक्षा बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से ग्रहण की। एलएलबी करने के बाद आपका विवाह ग्राम कांटा, तहसील चंदौली जिला वाराणसी (वर्तमान में चंदौली जिला) के चौधरी सहदेव सिंह एडवोकेट की सुपुत्री यशोदा देवी के साथ हुआ। एलएलबी करने के बाद आपने वाराणसी जिला कचहरी में वकालत शुरू की। शीघ्र ही आपका चयन मुंसिफ (पीसीएस जे) के पद पर हो गया।
आपने उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में बतौर न्यायाधीश काम किया। फरवरी 1984 में आप जनपद न्यायाधीश गाजीपुर से सेवानिवृत्त हुए। आपको पत्नी यशोदा देवी के माध्यम से चार पुत्र एवं एक पुत्री की प्राप्ति हुई। सन 1964 में आपकी पत्नी यशोदा देवी की देहावसान हो गया। इसके बाद बाबू प्रेम सिंह ने ही पांचों संतानों की परवरिश की। दूसरी शादी नहीं की। आप समाज को एवं अपने पुत्रों व पुत्री को सदैव शिक्षा के महत्व को बताते थे। कहते थे कि अपने संसाधनों को दिखावे और फिजूलखर्ची में व्यर्थ नहीं करना है।
इसी सिद्धांत के कारण वह सादा जीवन जीते थे। आप अंध विश्वास, पाखंड, दिखावा एवं मंदिर-मस्जिद से दूरी बनाकर रहते थे। आप ईवी रामासामी नायकर पेरियार की पुस्तकों को पढ़ते थे। शिक्षा एवं विज्ञान के प्रति आपकी प्रेरणा से आपके पुत्रों व पुत्री ने भी सफलता की ऊंचाइयों को हासिल किया। बड़े पुत्र मुक्तेश्वर नाथ सिंह (स्वर्गीय) अपर महाधिवक्ता उच्च न्यायालय इलाहाबाद के पद तक पहुंचे। इनके पुत्र अमित कुमार सिंह एडिशनल चीफ स्टैंडिल काउंसिल उच्च न्यायालय इलाहाबाद रह चुके हैं। आपकी पुत्री डॉ. नलिनी सिंह एमएस (गायकोलॉजी) जनपद मऊ में हैं। आपके दूसरे पुत्र अविमुक्तेश्वर नाथ सिंह ज्वाइंट डायरेक्टर प्राजीक्यूशन के पद से सेवानिवृत्त हुए और लखनऊ में निवास करते हैं। आपके तीसरे पुत्र शैलेश्वरनाथ सिंह जिला जज के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं और लखनऊ में ही रहते हैं। चौथे पुत्र डॉ. वृजेश्वरनाथ सिंह एमडी (मेडिसन) हैं। रांची में रहते हैं। जमालपुर के गौरव बाबू प्रेम सिंह ने 28 सितंबर 2019 को अंतिम सांस ली।
कुर्मियों की बातें : चुनार क्षेत्र के भामाशाह के नाम से जाने जाते थे 'प्रमुख जी'
Mon, Dec 1, 2025
राजेश पटेल, कैलहट/चुनार।
चुनार का डंका ऐसे ही पूरे विश्व में नहीं बज रहा है। वीरों की इस धरती में भामाशाह भी पैदा हुए हैं। अपनी मेहनत के बल पर खुद को खड़ा किया और दूसरों को भी खड़ा होने में मदद की। ऐसे ही एक शख्स थे-प्रमुख जी। जी हां, बाबू शिवकेदार सिंह जी। 13 स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों वाले गांव बगही में पैदा जरूर हुए, लेकिन ईंट भट्ठे के व्यवसाय में आने के बाद अपना ठिकाना कैलहट में शिवशंकरी धाम के पास बना लिया।
एक समय था, जब नरायनपुर से चुनार के बीच तीन महानुभाव ही ऐसे थे, जिनके पास हर पार्टी का, हर जाति का, हर संप्रदाय का व्यक्ति पहुंचता तो सभी को बराबर आदर ही मिलता। कैलहट में रामबुलावन सिंह, शिवकेदार सिंह और परसोधा बाजार में प्रेम सिंह। रामबुलावन सिंह और प्रेम सिंह के बारे में आप पढ़ चुके हैं। आज बाबू शिवकेदार सिंह के बारे में... स्व. शिव केदार सिंह पुत्र स्व. ज्ञान दास सिंह ग्राम व पोस्ट बगही, चुनार, मिर्जापुर का जन्म तीन अक्टूबर 1933 को हुआ। इनका देहावसान 10 जनवरी 2020 को हो गया। शिव केदार सिंह बचपन से ही पढ़ने लिखने में बड़े होशियार थे। उन्होंने प्राथमिक शिक्षा गांव के विद्यालय से लेने के बाद पीडीएनडी इंटर कॉलेज चुनार से कक्षा 10 तक की शिक्षा प्राप्त की। इंटर की पढ़ाई प्रभु नारायण राजकीय इंटर कॉलेज रामनगर से की। फिर काशी हिंदू विश्वविद्यालय में बीएससी में एडमिशन लिया, लेकिन आगे की पढ़ाई स्वरोजगार के उद्देश्य से नहीं की।
इसके बाद उन्होंने तीन वर्ष तक लगातार अपने घर की खेती की तथा उसके बाद पचेवरा के आशिक राम के साथ 1965 में ईंट का भट्ठा प्रारंभ किया। कुछ दिनों बाद स्वयं अकेले ईंट का भट्ठा का व्यवसाय शुरू किया। कैलहट में कई जगह पर अलग-अलग ईंट के भट्टों का संचालन किया। ईंट भट्ठा संघ के कोषाध्यक्ष, सचिव एवं अध्यक्ष भी रहे। इसके बाद राजनीति में आ गए। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का प्राथमिक सदस्य बने। प्रदेश स्तर की इकाई में भी पीसीसी सदस्य रहे। मिर्जापुर जनपद के लगभग 30 वर्षों तक जिला कांग्रेस कमेटी के कोषाध्यक्ष थे। 2018-19 में जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष भी हुए। 1985 में नारायणपुर ब्लाक के ब्लॉक प्रमुख चयनित हुए तथा अपने दो कार्यकाल के बाद पत्नी श्रीमती सावित्री देवी को तीसरे कार्यकाल में चयनित कराया। क्योंकि उस समय महिला सीट नारायणपुर ब्लॉक में हो गया था।
1980 में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र धरमपुर का प्रस्ताव वहां के गांव के लोगों ने इनके सामने रखा, जो 1982 में बनकर तैयार हो गया। तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री उत्तर प्रदेश पंडित लोकपति त्रिपाठी ने उद्घाटन किया था। आज क्षेत्र का सबसे अच्छा 25 बेड का हॉस्पिटल बनकर करके सभी सुविधाओं से युक्त है।
चुनार तहसील के अंतर्गत आने वाले अशासकीय इंटर कॉलेज के पदाधिकारी भी रहे। चुनार विधानसभा से कांग्रेस के टिकट पर दो बार विधायक का चुनाव लड़े, लेकिन उसमें उन्हें सफलता नहीं मिली। सोनिया गांधी, सलमान खुर्शीद, श्याम लाल यादव जैसे बड़े नेताओं से उनके अच्छे संबंध थे। वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी के बहुत पुराने लोग भी उनके संपर्क में थे। वर्तमान पदाधिकारी भी उनके सानिध्य को प्राप्त करते थे।
जब तक वह ब्लॉक प्रमुख थे, सरकार से मिलने वाला यात्रा भत्ता कभी भी प्राप्त नहीं किया। चुनार तहसील में वकीलों के लिए हाल उन्होंने बनवाया था। चुनार तहसील के पास की पुलिस चौकी का निर्माण भी उन्हीं के द्वारा कराया गया था। अदलपुरा में मंदिर के बड़ा हादसा हुआ था। कई मकानों को गिर जाने के बाद जिलाधिकारी प्रशांत मिश्रा द्वारा चंदा मांगे जाने पर एक लाक रुपये का योगदान किया था।
क्षेत्र में कभी कोई भी व्यक्ति किसी भी तरह की आशा लेकर उनके पास जाता था तो वह निश्चित रूप से उसकी मदद करते थे। वह आर्य समाज को मानते थे, लेकिन सभी धर्म के लोगों का समान सम्मान करते थे। सतुवा बाबा का आश्रम का निर्माण भी उनके द्वारा कराया गया। वहां गायों को पालने के लिए पूरा सहयोग दिया।
अपने ब्लॉक प्रमुख के कार्यकाल में उन्होंने सभी 119 गांवों को खड़ंजा एवं पुलों से संपर्क मार्ग के रूप में जोड़ने का पूरा प्रयास किया। राजकीय डिग्री कॉलेज चुनार जो वर्तमान में विश्राम सिंह राजकीय महाविद्यालय बन गया है, उसकी जमीन पिरल्लीपुर ग्राम प्रधान से लेकर शासन को दिया गया, जिसका उद्घाटन उन्होंने मोतीलाल बोरा राज्यपाल द्वारा कराया। उनके कार्यकाल में सरकारी योजनाओं का पूरा का पूरा लाभ गांवों को प्राप्त होता था। इसी क्रम में कैलहट-बगही- गांगपुर-जलालपुर माफी-चुनार वाले मार्ग का भी 1970 से 72 तक अपने द्वारा लिए गए ठेके के तहत निर्माण करवाया था।
पटेल धर्मशाला इलाहाबाद में एक रूम बनवाया। उनका उद्देश्य था कि जो लड़के यूपीएससी की परीक्षा देने या तैयारी करने की दृष्टि से अपने क्षेत्र से जाएंगे, वह वहां रहेंगे। बाद में वह पटेल सेवा संस्थान इलाहाबाद के नाम से चल रहा है। वर्तमान में उनके नाम से अलमारी एवं पुस्तकों के लिए 21 हजार रुपये का योगदान उनके पुत्र प्रोफेसर विजय कुमार सिंह प्रदेश सचिव भारतीय कुर्मी महासभा द्वारा दिया गया।
इसी तरह वाराणसी में भी पटेल धर्मशाला तेलिया बाग में व्यक्तिगत रूप से अपने नाम से रूम का निर्माण करवाया तथा विंध्याचल पटेल धर्मशाला में भी भरपूर योगदान किया। विभिन्न पटेल संस्थानों में चंदा के रूप में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। मिर्जापुर के एसपी रहे बद्री प्रसाद से कहकर कैलाहट पुलिस चौकी का समाज के लोगों के द्वारा चंदा लेकर निर्माण करवाया। अपने समाज के प्रति बहुत जागरूक थे और चाहते थे कि अपने समाज के बच्चे अधिक से अधिक आगे निकलकर के आएं और अपने समाज का नाम रोशन करें। आज वह हम सभी के बीच के नहीं हैं, लेकिन कैलहट से गुजरते समय नजर उनके घर की तरफ घूम ही जाती है। दरअसल सभी की निगाहें 'प्रमुख जी हैं कि नहीं' देखने की आदी हो गई हैं। उनकी खासियत यह थी कि किसी अतिथि के आने पर उसकी सेवा में वह खुद जुट जाते थे। नौकर-चाकर रहने के बावजूद घर के अंदर से मीठा, पानी, चाय, नमकीन खुद लेकर आते थे और अतिथि के सामने रख देते थे। चाहे कोई हो, सभी के प्रति सम्मान का भाव बराबर था। इसीलिए उनके यहां सभी लोग जाते थे। किसी को भी चाय नाश्ता कराए बिना जाने नहीं देते थे।
कुर्मियों की बातें : समाज के हीरा हैं डॉ. जवाहर सिंह
Mon, Dec 1, 2025
राजेश पटेल, नरायनपुर/मिर्जापुर ।
चुनार क्या, पूरे जिले में डॉ. जवाहर सिंह को कौन नहीं जानता होगा। शख्सियत ही ऐसी है। प्रख्यात चिकित्सक के साथ समाजसेवी। समाजसेवा आयकर बचाने के लिए नहीं, उद्देश्य सिर्फ जरूरतमंदों की सेवा है।
डॉ. सिंह 90 वर्ष की दहलीज पर हैं, लेकिन आज भी उसी भाव से मरीजों के साथ समाज की सेवा में जुटे हैं। इनके बारे में जानना जरूरी है।
डॉ. जवाहर सिंह का जन्म 15 दिसंबर 1936 को हुआ था। वर्ष 1960 में बीएचयू से एबीएमएस की डिग्री ली। उस समय चाहते तो आसानी से सरकारी डॉक्टर बन जाते, लेकिन गांव में रहकर ग्रामीणों की सेवा को उन्होंने प्राथमिकता दी। नरायनपुर में प्रैक्टिस शुरू कर दी।
नरायनपुर बाजार चुनार तहसील में ही पड़ता है। यह क्षेत्र के मध्य में पड़ता है। यहां से अहरौरा, मिर्जापुर व बनारस आना-जाना आसान है। अहरौरा रोड रेलवे स्टेशन भी था। रेलवे स्टेशन तो अब भी है, लेकिन लोगों की मांग पर इसका नाम बदलकर अब नरायनपुर बाजार कर दिया गया है। नाम बदलवाने में मिर्जापुर की सांसद अनुप्रिया पटेल ने काफी प्रयास किया, जो सफल रहा।
नरायनपुर में रहकर भी अपने गांव के बारे में सोचते रहते थे। उनको लगा कि उनके गांव अधवार में पोस्ट ऑफिस न होने से लोगों को काफी दिक्कतें हो रही हैं। सो उन्होंने काफी प्रयास करके गांव में ही डाकखाना खोलवा दिया। इंटर कॉलेज अहरौरा और भुड़कुड़ा में था। दोनों उनके गांव अधवार से दूर थे। लिहाजा गांव व क्षेत्र के संभ्रांत लोगों के साथ बैठकर गांव में ही इंटर कॉलेज की स्थापना का प्रस्ताव रखा। सभी ने सहयोग का वादा किया।
डॉ. जवाहर सिंह की अगुवाई में अधवार में 1964 में इंटर कॉलेज खुल गया। उसका नाम सर्वोदय इंटर कॉलेज रखा गया। इस विद्यालय के प्रबंधक के रूप में उन्होंने 18 साल तक इसके विकास का कार्य किया। इतना ही नहींं, अहरौरा में वनस्थली महाविद्यालय की स्थापना में भी अहम भूमिका निभाई। इसीलिए वह इस महाविद्यालय के उपाध्यक्ष भी रहे।
राष्ट्रीय इंटर कॉलेज शेरपुर तथा राम प्रसाद बालिका इंटर कॉलेज शेरपुर की प्रबंध समिति के अध्यक्ष के रूप में वर्षों तक शिक्षा के इन मंदिरों के विकास का कार्य किया। इसके अलावा भारत विकास परिषद सहित कई स्वयंसेवी संस्थाओं के पदाधिकारी रहे।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय में पढ़ते समय दौड़ में ऐसा रिकॉर्ड बना दिया, जो करीब 15 साल तक नहीं टूटा था। 1500 मीटर दौड़ में वह विजेता बने थे। करीब 90 साल की उम्र हो गई है, लेकिन डॉ. साहब पर यह उम्र हावी नहीं हो सकी है। इसका मुख्य कारण उनका समय प्रबंधन व उचित आहार-विहार है।
आज भी वह सुबह चार बजे बिस्तर छोड़ देते हैं। सर्दी, गर्मी या बरसात हो, वह पांच बजे सुबह तक स्नान कर ही लेते हैं। मॉर्निंग वाक का सिलिसला कभी टूटा नहीं। बाहर जाने में दिक्कत होती है तो घर के गलियारे में ही टहल लेते हैं। डॉ. जवाहर सिंह पहले नियमित एक घंटा बागवानी को देते थे। इसके बावजूद समय से ठीक नौ बजे क्लीनिक में आकर बैठ जाते थे। अब भी बैठ जाते हैं।
सुबह नौ बजे से 11 बजे तक तथा शाम को तीन बजे से छह बजे तक वह क्लीनिक में रहते हैं। समय के पाबंद इतने कि यदि कहीं 11 बजे पहुंचना है तो वह आज भी पांच मिनट पहले ही पहुंच जाते हैं। व्यवहार कुशल व मृदुभाषी डॉ. जवाहर सिंह ने 25 साल तक अपने यहां निःशुल्क नेत्र ऑपरेशन शिविर लगवाया है।
इस शिविर के माध्यम से हर वर्ष सौ से ज्यादा लोगों को ज्योति मिलती थी। इसमें वह किसी से कोई सहायता नहीं लेते थे। मरीजों के एक सप्ताह तक रहने, खाने, दवा आदि का खर्च खुद वहन करते थे। ऑपरेशन, चश्मा व हरी पट्टी के लिए भी कुछ नहीं लेते थे। पूरी तरह से फ्री। इसके अलावा भी वह किसी न किसी बहाने जरूरतमंदों की मदद आज भी करते रहते हैं।
आज की महंगाई में भी मरीजों को देखने की फीस मात्र 50 रुपये लेते हैं। किसी के पास यह भी नहीं है, तो कोई जबरदस्ती नहीं। उनकी ही परंपरा को उनके सुपुत्र डॉ. प्रवीण पटेल आगे बढ़ा रहे हैं। प्रवीण डेंटिस्ट हैं। पिता-पुत्र का क्लीनिक एक ही परिसर में है।