काम की बात : अगड़े और पिछड़े में क्या अन्तर है?
Fri, Dec 19, 2025
आचार्य प्रवर निरंजन
'अगड़ा' और 'पिछड़ा' एक सापेक्षिक अवधारणा है| अगड़ा और पिछड़ा जीवन के हर क्षेत्र, हर प्रक्रम और हर स्थिति में बना रहेगा| यह अगड़ा और पिछड़ा कोई भी हो सकता है| इस अवधारणा में व्यक्ति, परिवार, समाज, समूह, संस्कृति या राष्ट्र शामिल हो सकता है| आप इस सूची का अपनी स्वेच्छा से ‘और’ विस्तार करने के लिए कुछ और शब्द जोड़ सकते हैं| यहाँ यह प्रश्न महत्वपूर्ण होगा कि कोई 'अगड़ा' क्यों बन जाता है और कोई 'पिछड़ा' क्यों हो जाता है? मैं यहाँ किसी पर दोष –निर्धारण नहीं करने जा रहा हूँ, अपितु मैं सिर्फ कारण –परिणाम तक सीमित रहूँगा|
किसी के 'अगड़े' और 'पिछड़े' होने क्या अन्तर है? यह एक अनिवार्य प्रश्न है, जिसे हर कोई को समझना चाहिए। इस मूल कारण को पहचान कर कोई भी कभी भी अगड़ा बन सकता है। इस अगड़े और पिछड़े होने के अन्तर का एक ही कारण है, जिसे सावधानी से समझना चाहिए| दरअसल एक व्यक्ति, या परिवार, या समाज दो भिन्न समय में या दो भिन्न सन्दर्भ में कभी अगड़ा और कभी पिछड़ा हो जाता है। वैसे सभी मौजूदा जीवित मानव ‘होमो सेपियन्स सेपियन्स’ ही हैं, और सभी एक ही ‘विस्तारित परिवार’ (Extended Family) का सदस्य हैं। इसीलिए आज का सभी जीवित मानव हर बौद्धिक कार्य करने लिए समान रुप से सक्षम एवं योग्य है|
जो ज्ञान -अर्जन में अपने को पूर्ण समझेगा, वह अपने ज्ञान का संवर्धन छोड़ कर दूसरे क्षेर्त्रों में उलझा रहेगा, वह पिछड़ा ही रहेगा। जो अपने को ज्ञान में पूर्ण होना समझ लिया, वैसा व्यक्ति समय के बदलने के अनुरुप समायोजित और संवर्धित नहीं होना चाहता। समस्याओं का समाधान हमारे सोचने के तरीके में बदलाव से शुरू होता है, न कि केवल हमारे कार्यों में। ऐसा ही व्यक्ति विचार में परिमार्जन और संवर्धन छोड़ कर सिर्फ संसाधन जुटाने और संगठन बना कर अगड़े की श्रेणी में आना चाहता है|
जो भी ऐसा समझता है कि उसे अपनी समस्या के कारण की समुचित और पर्याप्त जानकारी है और वह उस समस्या के समाधान की पर्याप्त समझ भी रखता है, तभी वह सीखना समझना रोक देता है| जब उसे लगता है कि उसके महापुरुषों ने उसकी समस्यायों का समाधान का पता कर लिया है, तब वह ज्ञानार्जन में ठहर जाता है| उसका ध्यान इस पर नहीं जाता है कि हर क्षण परिस्थितीयाँ बदलती रहती है और इसीलिए हर समस्या की प्रकृति भी प्रवाहमान रहती है|
प्रसिद्ध वैज्ञानिक और दार्शनिक
अल्बर्ट आइन्स्टीन
ने कहा था कि समस्या चेतना के जिस स्तर खड़ा है, उसका समाधान चेतना के उसी स्तर पर रह कर नहीं पाया जा सकता है|इसके साथ यह भी कहते हैं कि एक ही तरह की सोच को दोहराने से संभवतः वही परिणाम प्राप्त होंगे। कई समस्याएं आदतों, मान्यताओं और धारणाओं का परिणाम होती हैं। किसी समस्या को हल करने के लिए केवल अधिक प्रयास करना ही काफी नहीं है, बल्कि अलग तरीके से सोचना भी जरूरी है।
प्रसिद्ध क्रान्तिकारी दार्शनिक
एन्टोनियो ग्राम्शी
ने भी
‘सांस्कृतिक वर्चस्ववाद’ (Cultural Hegemony)
में यही समझाते हैं, कि विरोधियों की अवधारणाओं को ही सही मानकर समाधान की उम्मीद करना उनकी दलदलों में डूब जाना होता है| समस्याएं केवल बाहरी चुनौतियां नहीं हैं, बल्कि आंतरिक चिंतन का प्रतिबिंब हैं। केवल गति ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि ठहर कर गहराई में उतरना भी जरूरी है। पुरानी सोच किसी समस्या के अस्तित्व का कारण तो समझा सकती है, लेकिन हमेशा उसे दूर नहीं कर सकती। ऐसे पिछड़े लोग अपने नवाचारी ज्ञानार्जन रोक कर सिर्फ सड़कों पर उतरना जानता है|
अपने ज्ञान को अपूर्ण समझने की शास्वत प्रकृति, प्रवृत्ति और नजरिया वाले लोग ही 'अगड़े' होते हैं| ज्ञान किसी विषय में सूचनाओं का संगठित एवं व्यवस्थित संग्रह होता है| चेतना को विकसित करने को तत्पर रहने वाला ही ‘अगड़ा’ होता है| ऐसा समझने वाला व्यक्ति, परिवार, समाज, संस्कृति और राष्ट्र सदैव अग्रणी रहेगा। किसी के ‘अगड़ा’ होने का एकमात्र करण यही होता है|
यही पिछड़े और अगड़े में मूल, मौलिक और आधाभूत अन्तर है। लेकिन ऐसा क्यों होता है?
प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक
अल्फ्रेड एडलर
अपने
'श्रेष्ठतावाद' (Striving for Superiority)
में समझाते हैं कि प्रत्येक मानव हीनता की भावना से ग्रस्त होता है और वह श्रेष्ठ बनना या दिखना चाहता है। अल्फ्रेड एडलर का 'श्रेष्ठतावाद' का सिद्धांत बताता है कि हर व्यक्ति बचपन में हीनता (Inferiority) की भावना महसूस करता है और इस भावना पर काबू पाने और व्यक्तिगत विकास हासिल करने के लिए श्रेष्ठता चाहता है। यही भावना मानव व्यवहार की मुख्य प्रेरक शक्ति है। यह प्रयास किसी को स्वस्थ रूप से सामाजिक हित और उपलब्धि की ओर ले जा सकता है, या किसी को अस्वस्थ रूप से अहंकार या प्रभुत्व की ओर ले जा सकता है। मुख्य विषय पर जाने से पहले हमलोग एक प्रसंग पर ठहरते है
कुछ वर्षों पहले की बात है। एक प्रोफेसर ने अपने 'युद्ध विज्ञान' (Military Science) के क्लास में छात्रों से पूछा कि दुनिया में सबसे शक्तिशाली देश कौन है? उत्तर आया - संयुक्त राज्य अमेरिका। जवाब सही था। अगला सवाल था कि दुनिया का सबसे डरपोक देश कौन है? उत्तर की प्रत्याशा में क्लास में सन्नाटा छा गया। फिर प्रोफेसर ने बताया कि दुनिया सबसे डरपोक देश भी संयुक्त राज्य अमेरिका ही है। अकल्पनीय उत्तर था। परन्तु ऐसा कैसे सम्भव है? जो डरपोक होता है, वह अपने सभी संभावित खतरों के प्रति अति सावधान और सतर्क होता है। एक डरपोक ही अपने सभी संभावित कमजोर पक्षों को मजबूत करता है, ताकि उसे कोई किसी भी क्षेत्र में नुकसान नहीं पहुँचा सके| इसके लिए वह अति सावधान एवं सजग रहकर अपने कमजोर पक्षों को पहचानते रहते हैं और समय के अनुसार अपने को संशोधित, परिमार्जित और संवर्धित करते होते हैं| उसका यही भाव उसे सशक्त बनने को बाध्य करता है|
आज का आधुनिक मानव भी इसी डर की भावना के कारण ही एक पशु से मानव बन सका| कोई चालीस लाख साल पहले हमारे पूर्वज वानर (Ape) थे और पेड़ों पर रहते थे| किसी खाद्य संकट के कारण कुछ कमजोर वानरों को पेड़ों से नीचे धकेल कर गिरा दिया गया और फिर से उन पेड़ों पर नहीं चढ़ने दिया गया| नीचे के झाड़ियों में छिपे खतरों को भापने और उनसे बचने के लिए उन्हें उचक उचक कर देखना होता था| इसी क्रम में वह सीधे खड़े होने का आदी होता गया और सीधा चलने वाला मानव बन सका| जंगल का सबसे कमजोर जीव अपने संभावित खतरों को समझने और उसका समाधान पाने के लिए अपनी चेतना के विकास करने को बाध्य हुआ| इसका परिणाम हमलोग के इस स्वरुप में सामने है|
उपरोक्त दोनों प्रसंगों पर ठहर कर विचार करें| दोनों से यही स्पष्ट होता हाँ कि कोई क्यों ‘वनमानुस’ ही रह गया और कोई क्यों विज्ञानमानुस’ बन गया| क्यों कोई जानवर ही रह गया और कोई क्यों ‘निर्माता मानव’ (Homo Faber), ‘सामाजिक मानव’ (Homo Socius), ‘वैज्ञानिक मानव’ (Homo Scientific) और ‘आध्यात्मिक मानव’ (Homo Spiritual ) बन सका| इन सभी का एक ही कारण है| कोई अपने चेतना के विकास को सदैव तत्पर रहता है और कोई चेतना के विकास में पर्याप्त संतुष्ट होता है| किसी के अगड़े होने और किसी के पिछड़े रह जाने का यही एक कारण है|
क्या भगवान वास्तविक है? : विज्ञान, धर्म और आधुनिक समाज में तर्कशीलता की लंबी लड़ाई
Tue, Dec 16, 2025
लाला बौद्ध
मृत्यु जब पास आती है, तो क्या सचमुच भगवान याद आने लगता है? क्या शरीर के कमजोर पड़ते ही आत्मा किसी अदृश्य शक्ति की तलाश करने लगती है? या यह सिर्फ एक सामाजिक-conditioning है, जिसे सदियों से हमारे भीतर भरा गया है—इतना गहरा और इतना व्यवस्थित कि अंतिम सांस तक हम उसके प्रभाव से बाहर नहीं आ पाते?
यह सवाल आज के समय में और भी सख्त हो जाता है, क्योंकि हम 2025–26 की दुनिया में खड़े हैं—जहाँ विज्ञान, तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) मानव इतिहास की सबसे बड़ी छलांगें लगा चुकी हैं। ऐसे समय में यह पूछना न सिर्फ उचित है, बल्कि अनिवार्य है कि क्या आज भी धर्म को आँख मूँदकर मानना आवश्यक है? धर्म आखिर है क्या? किसने बनाया? और क्यों बनाया?
हमारे सामाजिक ढांचे में ये सवाल अक्सर असहज कर देते हैं। लेकिन तर्क की दुनिया में असहजता एक स्वस्थ लक्षण है। आज की इस चर्चा में हमारे साथ हैं कवि, वैज्ञानिक और सामाजिक आलोचक श्री गौहर रज़ा, जिनकी दृष्टि इस उलझी हुई बहस को एक वैचारिक स्पष्टता देती है।
विज्ञान और भगवान का प्रश्न: दो भिन्न संसार
श्री रज़ा का मानना है कि “क्या ईश्वर है?” यह विज्ञान का प्रश्न नहीं है।
यह एक अनुभवजन्य या प्रयोगशाला-आधारित सवाल नहीं हो सकता। विज्ञान प्रमाण चाहता है—देखने, मापने और दोहराने योग्य प्रमाण। ईश्वर का विचार प्रत्यक्ष नहीं बल्कि काल्पनिक है, और विज्ञान काल्पनिकताओं को तब तक स्वीकार नहीं करता जब तक उनके लिए प्रमाण न मिल जाएं।
विज्ञान यह न सिद्ध कर सकता है कि ईश्वर है, न यह सिद्ध कर सकता है कि ईश्वर नहीं है।
यही कारण है कि ईश्वर का प्रश्न दर्शन और मनोविज्ञान के दायरे में आता है—साइंस के दायरे में नहीं।
लेकिन रज़ा साहब की व्यक्तिगत स्थिति स्पष्ट है,
वे किसी अलौकिक शक्ति में विश्वास नहीं रखते।
वे कहते हैं:
“यदि कोई सर्वशक्तिमान सत्ता है और वह दुनिया भर में हो रहे अत्याचारों को रोक सकती है लेकिन नहीं रोकती, तो मैं उसकी पूजा नहीं कर सकता। मैं तो उससे नफरत कर सकता हूँ।”
यह विचार धार्मिक भावुकता पर तर्क की रोशनी डालता है। यदि भगवान सर्वज्ञ भी है, सर्वशक्तिमान भी है, और दयालु भी है—तो दुनिया इस कदर अन्याय से भरी कैसे है?
धर्म इस सवाल का उत्तर “भगवान की लीला” या “कर्मों का फल” कहकर देता है।
विज्ञान कहता है—ये सब मानव समाज और इतिहास की संरचनाएँ हैं; किसी अदृश्य शक्ति का खेल नहीं।
धार्मिक conditioning: जन्म से मृत्यु तक ‘इंडॉक्ट्रिनेशन’ की प्रक्रिया
समाज में धर्म एक व्यक्तिगत आस्था नहीं रह गया है; यह एक सांस्कृतिक और राजनीतिक संरचना बन चुका है।
बच्चा जन्म लेता है और उसे पहली बार दूध से पहले धार्मिक संस्कार मिलते हैं।
पहली बार आँख खोलता है—घर में पूजा की घंटियाँ।
बाहर निकले—मंदिर, मस्जिद, गिरजा।
स्कूल जाए—धार्मिक प्रतीक।
टीवी देखे—धार्मिक धारावाहिक।
मोबाइल खोले—भगवा/इस्लामी reels।
मरे—तो अंतिम संस्कार धार्मिक रीति से।
यह जीवन की पूरी यात्रा पर एक प्रकार की धार्मिक ‘कारपेट बॉम्बिंग’ है।
यह मान लेते हैं कि धर्म व्यक्ति की पसंद है, लेकिन सच यह है कि धर्म पसंद नहीं, थोपे गए पैकेज का नाम है।
बच्चे को यह विकल्प नहीं दिया जाता कि वह बड़ा होने के बाद चाहे तो किसी धर्म में रहे, चाहे तो किसी में न रहे।
वह उस परिवार, उस जाति, उस संस्कृति और उस धार्मिक पहचान में जन्म लेता है—और वही उसकी “पहचान” बना दी जाती है।
यहीं से इंडॉक्ट्रिनेशन शुरू होता है।
धर्म का बाजार: आस्था का औद्योगिक मॉडल
जहाँ भी भीड़ है, वहाँ बाजार है।
जहाँ भी डर है, वहाँ कोई न कोई व्यापारी लाभ कमा रहा है।
धर्म की दुनिया एक विशाल उद्योग बन चुकी है—जिसमें:
• मंदिर/मस्जिद/गुरुद्वारे का विस्तार,
• गुरु-बाबाओं का साम्राज्य,
• चमत्कारों का व्यापार,
• जड़ी-बूटियों और ‘ऊर्जा’ उत्पादों के MLM नेटवर्क,
• और राजनीतिक संरक्षण—सब शामिल है।
आध्यात्मिक बाजार का मॉडल बहुत सरल है:
डर बेचो + समाधान बेचो = पैसा
जब भय “नरक” का हो, “कर्मफल” का हो, “ग्रहों की शांति” का हो—तो समाज का एक बड़ा हिस्सा बिना सवाल किए अपनी जेब खोल देता है।
आज देश में कई “धार्मिक ब्रांड” ऐसे हैं जिनकी संपत्ति से हर सरकारी स्कूल के बच्चे को एक साल की छात्रवृत्ति दी जा सकती है।
लेकिन यह धन समाज को लौटता नहीं—बल्कि और अधिक तंत्र, और अधिक अंधविश्वास पैदा करने में लग जाता है।
धर्म-उद्योग तीन तरह के लोगों के सहारे चलता है:
1. खरीदे गए लोग –
जिन्हें धन व सुविधा देकर प्रचारक बनाया जाता है।
2. सच्चे विश्वासी –
जो भोलेपन में इस मशीनरी के ईंधन बन जाते हैं।
3. सार्थक/स्वार्थी लोग –
जो धार्मिक संस्थानों को काला धन सफेद करने और राजनीतिक लाभ के लिए उपयोग करते हैं।
धर्म बनाम विज्ञान: यह टकराव क्यों होता है?
धर्म और विज्ञान को अक्सर एक-दूसरे के विरोधी के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
लेकिन यह विरोध असल में उनके स्वभाव और तरीके के अंतर के कारण है।
1. धर्म पूछता है—“क्यों?
”
विज्ञान पूछता है—“कैसे?”
धर्म का अंतिम उत्तर होता है—“यह ईश्वर की इच्छा है।”
विज्ञान का अंतिम उत्तर होता है—“यह प्राकृतिक नियमों से संचालित है।”
2. धर्म में पुराना ज्ञान पवित्र है।
विज्ञान में सबसे नया ज्ञान सबसे सटीक।
धर्म सुधार या संशोधन को खतरा मानता है।
विज्ञान सुधार को ही प्रगति मानता है।
3. धर्म साक्ष्य नहीं, विश्वास मांगता है।
विज्ञान विश्वास नहीं, साक्ष्य मांगता है।
4. धर्म सवालों को सीमित करता है।
विज्ञान सवालों को विस्तार देने के लिए प्रेरित करता है।
इसीलिए इतिहास गवाह है कि धर्म के नाम पर हुए युद्ध, हिंसा, साम्प्रदायिक दंगे, सामाजिक विभाजन, सभी सत्य को दबाने, प्रश्न पूछने से रोकने और सत्ता को कायम रखने के औजार रहे हैं।
अंधविश्वास और वैज्ञानिक पड़ताल
भारत में अंधविश्वास सिर्फ धार्मिक दायरों में नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक आदत बन चुका है।
ज्योतिष हो, वास्तु हो, ग्रहों का प्रकोप, पिछले जन्म की यादें, चमत्कार, इन सब पर वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि इनमें कोई तार्किक आधार नहीं है।
• ग्रहों की स्थिति का मानव चरित्र या भविष्य पर कोई वैज्ञानिक प्रभाव नहीं।
• राशिफल मनोवैज्ञानिक भ्रम होता है—बरनम/फॉरर इफेक्ट।
• चमत्कार प्रकाश, छाया, भ्रम या चालाकी का खेल।
• पुनर्जन्म का कोई प्रमाण विश्व में अब तक नहीं मिला।
• टाइम ट्रैवल में अतीत में जाना अभी भी भौतिक रूप से असंभव।
समस्या यह है कि हम इन सब को “परंपरा” के नाम पर पवित्र मान लेते हैं और विज्ञान को “पश्चिमी साज़िश” बताने में लग जाते हैं।
नास्तिक बनाम आस्तिक: दो दृष्टियाँ, दो जिम्मेदारियाँ
नास्तिक कौन?
• जो किसी अलौकिक शक्ति में विश्वास नहीं करता,
• जो अपने कर्मों की जिम्मेदारी खुद लेता है,
• और जिसे यह पता होता है कि हमें अभी बहुत कुछ नहीं पता।
नास्तिकता अहंकार नहीं, ज्ञान की विनम्रता है।
आस्तिक कौन?
• जो किसी पुस्तक या गुरु द्वारा बताए गए “शाश्वत सत्य” में विश्वास करता है,
• और जिसे यह लगता है कि ब्रह्मांड के बारे में अंतिम सत्य पहले ही लिखा जा चुका है।
आज कहा जाता है कि मृत्यु के करीब आते ही लोग ईश्वर को याद करते हैं।
लेकिन यह एक सार्वभौमिक सत्य नहीं।
रज़ा साहब बताते हैं कि उनके पिता जीवन भर नास्तिक रहे—अंतिम दिन तक।
स्वयं वे भी नास्तिक ही हैं।
यह इसलिए संभव हुआ क्योंकि उनके घर में सवाल पूछने की आज़ादी थी—वह आज़ादी जिसे हमारा समाज आमतौर पर बच्चों से छीन लेता है।
आधुनिक भारत और तर्कशीलता की चुनौती
मीडिया, खासकर टेलीविज़न और सोशल मीडिया, आज अंधविश्वास फैलाने के सबसे बड़े औजार बन चुके हैं।
हर चैनल पर ज्योतिषाचार्य, लाइव चमत्कार, टोटके, ग्रहों की शांति—सब कुछ परोसा जा रहा है।
युवा पीढ़ी वैज्ञानिक सोच से जितनी दूर की जा रही है, उतना ही देश अपनी वास्तविक क्षमता खो रहा है।
भारत का वैज्ञानिक इतिहास—आर्यभट्ट से लेकर बोस और रमण तक—हमारे तर्क पर आधारित ज्ञान का गौरवपूर्ण प्रमाण है। लेकिन यह इतिहास आज धार्मिक मिथकों की धूल में दबाया जा रहा है।
भविष्य की राह: किस तरह का समाज चाहिए?
अगर हमें एक परिपक्व, न्यायपूर्ण और प्रगतिशील समाज बनाना है, तो कुछ मूलभूत कदम उठाने होंगे:
1. बच्चों को सोचने की आज़ादी देना
धर्म किसी व्यक्ति की इच्छा से अपनाया जाए—जन्म से नहीं थोप दिया जाए।
2. शिक्षा में वैज्ञानिक तर्क, इतिहास और दर्शन का विस्तार
सिर्फ विज्ञान नहीं, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण का प्रसार।
3. धर्म और राजनीति के गठजोड़ को तर्क से चुनौती देना
क्योंकि धार्मिक उन्माद का लाभ सबसे ज्यादा सत्ता को मिलता है, समाज को नहीं।
4. मीडिया में अंधविश्वास के प्रचार को सीमित करना
यह एक बड़ी नीति-स्तरीय चुनौती है।
5. समाज को बताना कि संदेह पाप नहीं—सृजन का साधन है
प्रश्न से डरने वाला समाज कभी स्वतंत्र नहीं हो सकता।
निष्कर्ष: आशा कहां है?
रज़ा साहब की पुस्तक Myths to Science युवाओं के बीच खूब पढ़ी जा रही है।
यह एक महत्वपूर्ण संकेत है कि इस देश का युवा अब भी सवाल पूछना चाहता है।
धर्म-उद्योग जितनी भी कोशिश करे, वैज्ञानिक तर्कशीलता की लौ अब बुझने वाली नहीं है।
धर्म और विज्ञान दो बिल्कुल अलग रास्ते हैं।
विज्ञान प्रकृति के नियमों को समझने का तरीका है।
धर्म मानव इतिहास की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति।
दोनों को गड्ड-मड्ड करने से फायदा किसी गुरु या सत्ता को होता है—समाज को नहीं।
यदि हम एक बेहतर दुनिया बनाना चाहते हैं, तो हमें बच्चों से लेकर युवाओं तक में सवाल पूछने की आदत जगानी होगी—और एक ऐसा वातावरण तैयार करना होगा जहाँ वे बिना डर, बिना अपराधबोध, बिना सामाजिक दबाव के सोच सकें, निर्णय ले सकें, और विज्ञान व मानवता के बीच संतुलन बना सकें।
यही वह दिशा है जिसमें हम एक तर्कसंगत, न्यायपूर्ण और प्रगतिशील समाज बना सकते हैं।
और शायद—यही वह दिशा है जिसमें इंसान अपनी वास्तविक क्षमता पहचान सकता है, बिना किसी अदृश्य सत्ता के भय और प्रलोभन के।
समाजसेवा को सम्मान : गुजरात में शालिनी सिंह पटेल को सरदार पटेल नेशनल अवार्ड
Tue, Dec 16, 2025
आनंद (करमसद)।
देशभर में सामाजिक सरोकारों, जनहित के मुद्दों और जमीनी संघर्षों में सक्रिय भूमिका निभा रहीं शालिनी सिंह पटेल, प्रदेश उपाध्यक्ष जनता दल यूनाइटेड, उत्तर प्रदेश एवं बुंदेलखंड प्रभारी, को “सरदार वल्लभभाई पटेल नेशनल गार्ड अवार्ड 2025” (नेशनल अवार्ड) से सम्मानित किया गया है। यह प्रतिष्ठित नेशनल अवार्ड The Sardar Mission एवं Sardar Patel Research Center द्वारा लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की 75वीं स्मृति दिवस के अवसर पर गुजरात के करमसद स्थित सरदार हाउस एवं सरदार वल्लभभाई पटेल मेमोरियल में आयोजित राष्ट्रीय समारोह में प्रदान किया गया।
इस नेशनल अवार्ड समारोह में शालिनी सिंह पटेल को यह सम्मान चिराग भाई पटेल द्वारा प्रदान किया गया। कार्यक्रम में देश के विभिन्न राज्यों से आए सामाजिक कार्यकर्ता, जनप्रतिनिधि, पत्रकार, युवा प्रतिनिधि, महिला संगठन, श्रमिक संघों के पदाधिकारी एवं बुद्धिजीवी वर्ग के लोग उपस्थित रहे। वक्ताओं ने कहा कि शालिनी सिंह पटेल ने बुंदेलखंड जैसे संवेदनशील क्षेत्र से निकलकर पूरे देश में महिलाओं, युवाओं, मजदूरों, किसानों, दिव्यांगजनों और वंचित वर्ग के अधिकारों के लिए निरंतर संघर्ष किया है।वक्ताओं ने यह भी कहा कि शालिनी सिंह पटेल का कार्य केवल राजनीतिक गतिविधियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने स्वास्थ्य, शिक्षा, महिला सुरक्षा, सामाजिक न्याय और जनकल्याण से जुड़े मुद्दों पर जमीनी स्तर से लेकर राष्ट्रीय मंच तक प्रभावी हस्तक्षेप किया है। उनके प्रयासों से कई मामलों में प्रशासनिक संवेदनशीलता बढ़ी और जरूरतमंद लोगों को राहत मिली।
नेशनल अवार्ड ग्रहण करते हुए अपने वक्तव्य में शालिनी सिंह पटेल ने कहा कि यह सम्मान उनका व्यक्तिगत नहीं है। उन्होंने कहा कि वह इस नेशनल अवार्ड को अपने बड़े भाई, अपनी माँ और अपने स्वर्गीय पिता जी को समर्पित करती हैं, जिनके संस्कार और संघर्ष उनके जीवन की सबसे बड़ी पूंजी हैं। उन्होंने कहा कि यह सम्मान उन पत्रकार साथियों, युवाओं, मजदूरों, महिलाओं, किसानों और दिव्यांगजनों को भी समर्पित है, जिनकी आवाज को उन्होंने हर मंच पर उठाया।
साथ ही उन्होंने कहा कि यह नेशनल अवार्ड उनके पिता तुल्य अभिभावक आदरणीय नीतीश कुमार जी और श्रवण कुमार जी को भी समर्पित है, जिनके मार्गदर्शन से उन्हें समाज सेवा और जनसेवा की दिशा मिली। उन्होंने कहा कि लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल के एक भारत, सशक्त भारत के विचारों से प्रेरित होकर वह आगे भी पूरी निष्ठा, ईमानदारी और प्रतिबद्धता के साथ देशव्यापी स्तर पर समाज सेवा का कार्य जारी रखेंगी।