समाजसेवा को सम्मान : गुजरात में शालिनी सिंह पटेल को सरदार पटेल नेशनल अवार्ड
Tue, Dec 16, 2025
आनंद (करमसद)।
देशभर में सामाजिक सरोकारों, जनहित के मुद्दों और जमीनी संघर्षों में सक्रिय भूमिका निभा रहीं शालिनी सिंह पटेल, प्रदेश उपाध्यक्ष जनता दल यूनाइटेड, उत्तर प्रदेश एवं बुंदेलखंड प्रभारी, को “सरदार वल्लभभाई पटेल नेशनल गार्ड अवार्ड 2025” (नेशनल अवार्ड) से सम्मानित किया गया है। यह प्रतिष्ठित नेशनल अवार्ड The Sardar Mission एवं Sardar Patel Research Center द्वारा लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की 75वीं स्मृति दिवस के अवसर पर गुजरात के करमसद स्थित सरदार हाउस एवं सरदार वल्लभभाई पटेल मेमोरियल में आयोजित राष्ट्रीय समारोह में प्रदान किया गया।
इस नेशनल अवार्ड समारोह में शालिनी सिंह पटेल को यह सम्मान चिराग भाई पटेल द्वारा प्रदान किया गया। कार्यक्रम में देश के विभिन्न राज्यों से आए सामाजिक कार्यकर्ता, जनप्रतिनिधि, पत्रकार, युवा प्रतिनिधि, महिला संगठन, श्रमिक संघों के पदाधिकारी एवं बुद्धिजीवी वर्ग के लोग उपस्थित रहे। वक्ताओं ने कहा कि शालिनी सिंह पटेल ने बुंदेलखंड जैसे संवेदनशील क्षेत्र से निकलकर पूरे देश में महिलाओं, युवाओं, मजदूरों, किसानों, दिव्यांगजनों और वंचित वर्ग के अधिकारों के लिए निरंतर संघर्ष किया है।वक्ताओं ने यह भी कहा कि शालिनी सिंह पटेल का कार्य केवल राजनीतिक गतिविधियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने स्वास्थ्य, शिक्षा, महिला सुरक्षा, सामाजिक न्याय और जनकल्याण से जुड़े मुद्दों पर जमीनी स्तर से लेकर राष्ट्रीय मंच तक प्रभावी हस्तक्षेप किया है। उनके प्रयासों से कई मामलों में प्रशासनिक संवेदनशीलता बढ़ी और जरूरतमंद लोगों को राहत मिली।
नेशनल अवार्ड ग्रहण करते हुए अपने वक्तव्य में शालिनी सिंह पटेल ने कहा कि यह सम्मान उनका व्यक्तिगत नहीं है। उन्होंने कहा कि वह इस नेशनल अवार्ड को अपने बड़े भाई, अपनी माँ और अपने स्वर्गीय पिता जी को समर्पित करती हैं, जिनके संस्कार और संघर्ष उनके जीवन की सबसे बड़ी पूंजी हैं। उन्होंने कहा कि यह सम्मान उन पत्रकार साथियों, युवाओं, मजदूरों, महिलाओं, किसानों और दिव्यांगजनों को भी समर्पित है, जिनकी आवाज को उन्होंने हर मंच पर उठाया।
साथ ही उन्होंने कहा कि यह नेशनल अवार्ड उनके पिता तुल्य अभिभावक आदरणीय नीतीश कुमार जी और श्रवण कुमार जी को भी समर्पित है, जिनके मार्गदर्शन से उन्हें समाज सेवा और जनसेवा की दिशा मिली। उन्होंने कहा कि लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल के एक भारत, सशक्त भारत के विचारों से प्रेरित होकर वह आगे भी पूरी निष्ठा, ईमानदारी और प्रतिबद्धता के साथ देशव्यापी स्तर पर समाज सेवा का कार्य जारी रखेंगी।
सामाजिक चिंतन : लड़ाई लड़नी होगी कि पिछड़े वर्ग की जातियां हिंदू नहीं हैं
Tue, Dec 16, 2025
नवल किशोर कुमार
सांस्कृतिक मोर्चे पर हम पिछड़ों की लड़ाई अभी तक मुकम्मल तरीके से प्रारंभ नहीं हो पाई है। हालांकि अपनी मृत्यु से पहले डॉ. आंबेडकर ने बौद्ध धर्म को अपनाकर इस लड़ाई का आगाज जरूर किया, लेकिन इस देश के पिछड़ों ने उसे स्वीकार नहीं किया। हो सकता है कि कुछ अपवाद रहे होंगे, जो दीक्षा भूमि में उस दिन मौजूद रहे होंगे और बाबा साहब के साथ ही बौद्ध धर्म को अपनाया होगा। लेकिन तथ्यों की रोशनी में देखें तो हम यही पाएंगे कि पिछड़ों को डॉ. आंबेडकर का यह आह्वान कि – भले ही हम हिंदू धर्म में जन्मे, लेकिन मरेंगे नहीं – रास नहीं आई। हाल के कुछ दशकों में पिछड़ों के एक छोटे से समूह ने बौद्ध धर्म को अपनाना प्रारंभ किया है। यह समूह अपने आपको सम्राट अशोक से जोड़ता है। बाजदफा तो यह समूह बुद्ध को अपनी जाति का बता देता है। इस तरह से देखें तो पिछड़ों के इस छोटे समूह ने बुद्ध के विचारों को नहीं, उनकी जाति को अपनाया है।
खैर, हम पिछड़े सांस्कृतिक मोर्चे पर किस तरह विफल रहे हैं, इसका अनुमान इसी मात्र से लगाया जा सकता है कि ब्राह्मण पिछड़े वर्ग में शामिल दो जातियों – कुर्मी और कोइरी (धानुक व दांगी क्रमश: इनमें शामिल) – को लव और कुश बना दिया। लव और कुश का मतलब राम के बेटे। और आश्चर्य नहीं कि इन जातियों के लोगों ने इसको स्वीकार भी कर लिया। लज्जा भी नहीं आई कि कैसे एक किसान समुदाय काे, जो अपने श्रम के लिए जाना जाता है, को एक ऐसे मिथक से जोड़ दिया गया, जिसके अपने जन्मने की कहानी संदिग्ध है।
यह हम पिछड़ों की सांस्कृतिक मोर्चे पर विफलता ही है कि यादव जाति जो कि एक कर्मठ जाति रही है, मवेशीपालन और कृषि कर्म कर समाज में अपनी भूमिका का निर्वहन करता है, को कृष्ण के मिथक से जोड़ दिया गया है। आज भी मुझे कई ऐसे लोग मिल जाते हैं जो मेरी जाति जानने के बाद ‘जय माधव, जय यादव’ का अभिवादन करते हैं। जबकि कृष्ण का पूरा चरित्र ही ब्राह्मणों की सेवा करने के लिए रचा गया है। हमारे लोग ब्राह्मणों के इस सांस्कृतिक आक्रमण से इस कदर परास्त हुए कि कृष्णवंशी ही बनकर रह गए। आज अपवाद को छोड़ दें तो यादव जाति के किसी नेता में इसका विरोध करने का साहस नहीं है। वे चाहे लालू यादव हों या फिर अखिलेश यादव।
लेकिन मैं पीछे मुड़कर देखता हूं तो ऐसा नहीं है कि हम पिछड़ों ने यह लड़ाई लड़ी ही नहीं। हम लड़े हैं। मैं तो बीसवीं सदी के आरंभ के वर्षों में चले जनेऊ आंदोलन के बारे में सोच रहा हूं। यह भी सोच रहा हूं कि कैसे पिछड़े वर्ग की जातियों ने आगे बढ़कर जनेऊ धारण करना प्रारंभ किया। उनकी सोच यह थी कि यदि वे जनेऊ धारण कर लेंगे तो उन्हें भी हिंदू मान लिया जाएगा, ब्राह्मण उन्हें अपने समकक्ष मानेंगे, सम्मान देंगे और जिस तरह से ब्राह्मणों को कम लगान देना पड़ता है, उन्हें भी कम लगान देना होगा। तब हमारे लोग यादव, कोइरी और कुर्मी नहीं ब्राह्मण बनना चाहते थे। यह एक तरह की लड़ाई ही थी, क्योंकि तब पिछड़े वर्गों के लोगों द्वारा जनेऊ पहनने को ब्राह्मणों और सामंतों ने अपना अपमान माना। उन्होंने सोचा कि अगर ये लोग जनेऊ पहनेंगे तो अपने आपको हमारे जैसा समझने लगेंगे व हमारी बहन-बेटियों का शील उल्लंघन करेंगे। फिर तो जनेऊ आंदोलन के दौरान हमलाें का एक लंबा सिलसिला मिलता है।
उदाहरण के लिए सन् 1899 में पटना जिले के मनेर स्थित हाथीटोला गांव में एक घटना घटित हुई। हाथीटोला यादवों का गांव है और यह आज भी है। उस समय बाबू टीपन प्रसाद सिंह, बाबू द्वारिका सिंह रईस, बाबू जगदीश सिंह, बाबू रामानंद सिंह पहलवान तथा रामप्यारे सिंह ने जनेऊ ग्रहण किया। ये सभी यादव जाति के थे। इनके द्वारा जनेऊ धारण करना ऊंची जातियों के हिंदुओं को बुरा लगा। एक कट्टरपंथी बाबू त्रिवेणी सिंह ने इसके खिलाफ एक विशाल सभा का आयोजन किया। इस सभा में यादव और अन्य जातियों के लोग शामिल हुए। आर्यसमाज के कट्टर विरोधियों – पंडित रायबहादुर दूबे, पंडित भैरवचरण मिश्र आदि को भाषण करने के लिए बुलाया गया। इसकी सूचना जब आर्यसमाजियों को मिली तो वे भी स्वामी ओंकार सच्चिदानंद, स्वामी मुनीश्वरानंद और पंडित रामचंद्र द्विवेदी के साथ सभास्थल पर आए। जब स्वामी ओंकार सच्चिदानंद ने ग्वालों द्वारा जनेऊ धारण करने के पक्ष में बोलना शुरू किया तो मनेर के रायबहादुर दूबे ने जनता में शोर मचाते हुए कहा कि यह साधु नास्तिक है और वे लोगों को भड़काने लगे। फिर उन्होंने जनता को स्वामीजी पर प्रहार करने का इशारा किया। कुछ लोग ताबड़तोड़ लाठी चलाने लगे। स्वामी जी के सिर में चोट लगी, काफी खून बहा। फिर भी उन्होंने आक्रमणकारियों पर मुकदमा करने से इंकार कर दिया।
एक घटना तत्कालीन मुंगेर कमिश्नरी के लाखोचक में घटित हुई थी। बड़ी संख्या में पिछड़े समाज के लोग जनेऊ घारण करने को एकजुट हुए। तभी ब्राह्मणों और सामंतों ने उनके ऊपर हमला कर दिया। दर्जनों घायल हुए। मामला इतना बढ़ा कि उस समय की ब्रिटिश पुलिस को इस दौरान 118 राऊंड गोलिया चलानी पड़ी थीं। इसमें भूमिहार और यादव जाति के लोग मारे गए।
इतना ही नहीं, वर्ष 1930 का दशक तो क्रांति का दशक साबित हुआ जब सरदार जगदेव सिंह यादव, शिवपूजन सिंह और जेएनपी मेहता ने मिलकर त्रिवेणी संघ का गठन किया। यह एक राजनीतिक संगठन था, जिसने सांस्कृतिक मोर्चा भी संभाला। सरदार जगदेव सिंह यादव को इस संगठन की माता कहा जाता है। लेकिन यह त्रिवेणी संघ रूपी यह मोर्चा अधिक दिनों तक खुद को नहीं संभाल सका और राजनीतिक स्वार्थों के कारण बिखर गया।
एक अहम प्रयास महामना रामस्वरूप वर्मा ने अर्जक संघ बनाकर किया। यह संघ आज भी है, लेकिन इसकी भी सीमाएं सामने आई हैं और अब यह बहुत हद तक सीमित हो गया। इसके बावजूद इस संघ ने एक राह दिखाई है कि कैसे हम पिछड़े अपनी सांस्कृतिक लड़ाई लड़ें। संघ आज भी लड़ रहा है कि बिना ब्राह्मण के शादी-विवाह हों, श्राद्ध भोज और पिंड तर्पण करने जैसे पाखंडों का विरोध करें। इसका विस्तार करने की आवश्यकता है। और यह लड़ाई ऐसे ही लड़ी जा सकती है।
बहरहाल, आज की बात करें तो इस देश के ब्राह्मण और बनियों ने सांस्कृतिक लड़ाई को लगभग जीत लिया है। कल से देश भर में चर्चा है कि मनरेगा योजना के नाम में से महात्मा गांधी का नाम हटाकर ‘जी राम जी’ जोड़ दिया जाएगा। मुमकिन है कि आज लोकसभा में इसके लिए एक विधेयक भी लाया जाएगा और इसकी पूरी संभावना है कि यह पारित भी हो जाएगा, क्योंकि लोकसभा में सत्ता पक्ष के पास पर्याप्त नरमुंड हैं, जिनका काम केवल हां में हां मिलाना है। ये नरमुंड दलित और पिछड़ों के भी हैं, जिन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं है कि ब्राह्मणों और बनियों ने 85 फीसदी समुदायों सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक अस्तित्व को बंधक बना लिया है।
मैं फिर कहता हूं कि सांस्कृतिक मोर्चे पर हम पिछड़ों की लड़ाई अभी तक मुकम्मल तरीके से प्रारंभ नहीं हो पाई है। लेकिन हमें यह लड़ाई लड़नी ही होगी और जीतनी होगी। कल ही मेरी जेहन में यह कविता आई–
सुनो यादवो,
कोइरियो, कुर्मियो, कहारो, बिंदो, हजामो और मल्लाहो,
सब सुनो।
आज जो तुम
खुद को हिंदू कहते हो
और ब्राह्मणों के कहने पर
किसी की गर्दन उतारने को उतारू रहते हो,
एक दिन जनेऊ पहन कर देखो
ब्राह्मण तुम्हारी गर्दन उतार देंगे।
Patelon Ki Baten : उत्तर प्रदेश में 'कमल' के निर्विरोध 'चौधरी' निर्वाचित हुए पंकज
Sat, Dec 13, 2025
लखनऊ।
भारतीय जनता पार्टी में उत्तर प्रदेश प्रदेश अध्यक्ष के चुनाव की प्रक्रिया के तहत केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ भाजपा नेता पंकज चौधरी निर्विरोध अध्यक्ष निर्वाचित हो गए हैं। प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए शुक्रवार को नामांकन की अंतिम समय-सीमा दोपहर 3 बजे तक थी, लेकिन तय समय तक पंकज चौधरी के अलावा किसी अन्य नेता ने नामांकन दाखिल नहीं किया। इसके चलते उनका निर्विरोध चुना जाना तय हो गया है, हालांकि औपचारिक घोषणा अभी बाकी है।
पंकज चौधरी के नामांकन के दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ उनके प्रस्तावक बने। उनके अलावा उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और ब्रजेश पाठक, पूर्व केंद्रीय मंत्री व सांसद स्मृति ईरानी, प्रदेश सरकार के मंत्री स्वतंत्र देव सिंह, सूर्य प्रताप शाही, सुरेश खन्ना और बेबी रानी मौर्य ने भी प्रस्तावक के रूप में समर्थन दिया।
पंकज चौधरी उत्तर प्रदेश की महाराजगंज लोकसभा सीट से सात बार सांसद चुने जा चुके हैं। वर्तमान में वे केंद्र सरकार में वित्त राज्य मंत्री के पद पर कार्यरत हैं। उनका जन्म 20 नवंबर 1964 को गोरखपुर में हुआ था। कुर्मी समुदाय से आने वाले पंकज चौधरी का परिवार भी राजनीतिक पृष्ठभूमि से जुड़ा रहा है। उनकी माता उज्ज्वल चौधरी महाराजगंज जिला पंचायत अध्यक्ष रह चुकी हैं।
पार्टी सूत्रों के अनुसार, संगठनात्मक अनुभव और लंबे राजनीतिक सफर को देखते हुए पंकज चौधरी का निर्विरोध चयन भाजपा की रणनीतिक मजबूती की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है। औपचारिक घोषणा के बाद उनके कार्यभार संभालने की प्रक्रिया पूरी की