Mirzapur : बगही निवासी डॉ. प्रवीण की पुस्तक प्रकाशित
Tue, Dec 2, 2025
कैलहट (मिर्जापुर)।
चुनार थाना क्षेत्र के अंतर्गत बगही गांव निवासी डॉ. प्रवीण बाबू ने "CONTEMPORARY INDIA AND EDUCATION " नामक पुस्तक का लेखन कार्य कर अपने गांव और क्षेत्र का मान बढ़ाया है। उन्होंने यह पुस्तक अपने विद्वान सहयोगी डॉ. नवदीप रंजन के सहयोग के साथ पूरा किया।
उन्होंने इस पुस्तक में भारतीय समाज में शिक्षा व्यवस्था , विश्व के कुछ प्रमुख चिंतकों के शैक्षिक और दार्शनिक विचारों को रखा। तथा हमारे समाज में व्याप्त जातिवाद ,क्षेत्रवाद, भाषावाद के प्रभावों का वर्णन करते हुए शिक्षा के संवैधानिक प्रावधानों पर प्रकाश डाला है । इसके साथ ही शिक्षा से संबंधित विभिन्न पहलुओं, आयोगों के प्रावधानों का आधुनिक भारतीय समाज में प्रभाव का वर्णन किया है।
डॉ. प्रवीण ने अपनी इस उपलब्धि का मुख्य श्रेय अपने दादा महात्मा प्यारेलाल सिंह, पिता- विजय सिंह, छोटे पिता बृजकिशोर सिंह , छोटी माँ सुनीता देवी, पत्नी काजोल सिंह ,छोटे भाई आनंद विक्रम के साथ ही अपने गांव तथा क्षेत्र के सभी लोगों को दिया।
यह पुस्तक शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े सभी प्रशिक्षुओं, शोधार्थियों, शिक्षाविदों, प्रतियोगी परीक्षार्थियों के लिए उपयोगी सिद्ध होगी। इस पुस्तक की प्रमाणिकता की जांच गूगल में ISBN– 9781257133246 या पुस्तक के शीर्षक/ लेखक के नाम से किया जा सकता है।
कुर्मियों की बातें : खुद कॉलेज का मुंह तक नहीं देखा, बनवा दिया भव्य महाविद्यालय, बूझिए कौन?
Mon, Dec 1, 2025
राजेश पटेल, चुनार/मिर्जापुर।
चुनार की मिट्टी में कुछ न कुछ तो खास है। इसे कोयले की आंच में तपाएं तो फौलाद से भी मजबूत ईंटें बन जाती हैं। टन-टन, खन-खन करती क्राकरी बन जाती है। शायद मिट्टी की ही विशेषता है कि यहां की धरती में रामबुलावन सिंह जैसे लोग भी पैदा हुए, जिन्होंने खुद तो कॉलेज का मुंह नहीं देखा, लेकिन जब मौका आया तो भव्य कॉलेज बनवा दिया। ताकि क्षेत्र के बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए दूर शहर न जाना पड़े। रामबुलावन सिंंह नरायनपुर ब्लॉक के शिवराजपुर गांव के निवासी थे। पढ़ा-लिखा न होने के कारण उनकी जन्मतिथि के बारे में सही जानकारी तो नहीं है, हां वर्ष 1922 था। जवान हुए तो आर्य समाज की विचारधारा से प्रभावित हुए। बाद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से। ज्योतिबा फुले, राजर्षि छत्रपति साहूजी महाराज, महात्मा गांधी तथा बाबा साहेब डॉ. आंंबेडकर की विचारधारा से भी वह बहुत प्रभावित थे।
पहले बात करते हैं कॉलेज की
बाबू रामबुलावन सिंह तथा उनकी पत्नी श्रीमती रमपत्ती देवी में कोई भी पढ़ा-लिखा नहीं था। शायद इसी कारण से दोनों शिक्षा के महत्व को समझते थे। इनके जीवन में एक दुःखद घटना हो गई। इनके पौत्र राजदीप का अपहरण कर अपराधियों ने उनकी हत्या कर दी। राजदीप बाल्यावस्था में ही थे। इस घटना ने उनको झकझोर कर रख दिया। समय के साथ जब इस दुख से कुछ उबरे तो कहा कि राजदीप होता तो पता नहींं क्या बनता, क्या न बनता। उसकी याद में ऐसा कुछ कर दिया जाए कि क्षेत्र के बच्चे पढ़-लिखकर इंसान के साथ रोजी-रोटी कमाने लायक बन जाएं। उस समय कैलहट के आसपास इंटर कॉलेज तो बहुत थे, लेकिन इसके आगे की पढ़ाई के लिए बालिका महाविद्यालय कोई नहीं था। ईट भट्ठा का व्यवसाय था। आर्थििक स्थिति ठीक-ठाक थी, सो 1998 में राजदीप के नाम पर बालिका महाविद्यालय की स्थापना कर डाली। 2000 में उद्घाटन भी हो गया। तब से लेकर आज तक यह महाविद्यालय चल रहा है। हजारों बच्चे हर साल ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट की डिग्री इस कॉलेज से लेते हैं। अब यह राजदीप महिला महाविद्यालय से राजदीप महाविद्यालय बन चुका है। मतलब को-एजुकेशन हो गया है। इनके बेटे तथा दिवंगत राजदीप के पिता इंजीनियर आरबी सिंंह इसकी देखरेख करते हैं।
सामाजिक समरसता
यदि छुआछूत सही है तो कुछ भी गलत नहीं है। इस सूत्रवाक्य को रामबुलावन सिंह ने अपने जीवन में उतार लिया था। मरते दम तक इस पर अडिग रहे। एक बार की बात है, रामबुलावन सिंह से मिलने कुछ लोग उनके कैलहट स्थित आवास पर आए थे। बातचीत में जल्दबाजी कर रहे थे। लोगों ने पूछा कि इतनी भी जल्दी क्या है। इस पर रामबुलावन सिंह ने कहा कि फलां आदमी के यहांं तेरहवीं है। पूड़ी खाने जाना है। वह फलां व्यक्ति जाति का चमार था। लोगों ने कहा कि अरे भइया चमार की पूड़ी खाने जाएंगे। उन्होंने कहा कि पूडी तो गेहूं के आटा की बनती है। इसमें जाति कहां से आ गई। फिर किसी की कुछ भी कहने की हिम्मत नहीं हुई। वह उठे और चमार के तेरहवीं की पूड़ी खाने चले गए। एक और घटना का जिक्र जरूरी है। उनके ही गांव शिवराजपुर के सरजू प्रसाद थे। चमार जाति के थे। सरजू प्रसाद मजदूरी करके अपना परिवार चलाते थे। गांंव के रिश्ते में वह रामबुलावन सिंह के चाचा लगते थे।। सरजू की एक बेटी थी। उसका नाम कलावती था। वह रामबुलावन सिंंह को भैया कहती थी। उसकी शादी जमाालपुर ब्लॉक के भोकरौध गांंव में हुई। रामबुलावन सिंह उसे अपनी छोटी बहन मानते थे। जब जमालपुर ब्लॉक के शेरवांं की ओर जाते, भोकरौध में उसके घर जरूर जाते। बार-बार आने-जाने के कारण भोकरौध के लोग रामबुलावन सिंह को कलावती का सगा भाई समझने लगे थे। इनको भी चमार के रूप में ही जानते थे।
छत्रपति साहुजी महाराज का प्रभाव
बाबू रामबुलावन सिंह छत्रपति साहुजी महाराज की विचारधारा से बहुत प्रभावित थे। एक बार की बात है। संघ का प्रचारक होने के नातेे उनका शेरवांं आना-जाना ज्यादा ही रहता था। वहां पर चमार जाति के एक व्यक्ति से मुलाकात हुई। सड़क पर उनकी जमीन थी। रामबुलावन सिंह ने कहा कि आपकी जमीन की लोकेशन ठीक है। यहां पर चाय की एक दुकान खोलिए। इससे घर-गृहस्थी ठीक से चलने लगेगी। उस व्यक्ति ने कहा कि चमार हूं, मेरेे हाथ से बनी चाय पिएगा कौन। रामबुलावन सिंंह ने कहा कि सड़क पर आने-जानेे वाले लोग चाय पीने के पहले आपकी जाति नहीं पूछेंगे। रही बात जो लोग परिचित हैं, उनकी इच्छा होगी तो पिएंगे, नहीं होगी तो नहीं पिएंगे। कोई फर्क नहीं पड़ेगा। दूसरे क्या सोचते हैंं या सोचेंगे, इसकी चिंता करने वाला व्यक्ति कमजोर होता है। आप कमजोर नहीं हैं। उस व्यक्ति ने चाय की दुकान खोली, पहली चाय रामबुलान सिंह ने खुद कैलहट से जाकर पी।
घर में भी सामाजिक न्याय का सिद्धांंत ही चलता था
रामबुलावन सिंह की पत्नी रमपत्ती देवी भी पढ़ी-लिखी नहीं थीं। 1950-60 में जब छुआछूत की प्रथा जारी थी। लोग कथित रूप से नीची जाति के व्यक्ति के छू जाने मात्र से खुद को अपवित्र मानने लगते थे। उस दौर में भी किसी भी जाति का हो या किसी भी धर्म का, रामबुलावन सिंहं के घर में ठहर (चौका में) पर बैठकर थाली में ही भोजन करता था। रमपत्ती देवी उन बर्तनों को साफ भी करती थीं। वह भी पढ़ी-लिखी नहींं थीं और ऐसे गांव (भवानीपुर) से आई थीं, जहां ब्राह्मण ज्यादा संख्या में हैं। लेकिन सामाजिक समरसता का संस्कार उनमें कूट-कूट कर भरा था। उनके लिए सारे लोग एक समान थे। उनमेंं समाज के लिए जागरूकता इस कदर थी कि स्वेच्छा से देहदान कर दिया था। पहली जनवरी 2022 को निधन होने के बाद उनके शरीर को बनारस हिंदू विश्वविद्यालय को सौंंप दिया गया।
कुर्मियों की बातें : बाबू प्रेम सिंह ने बाधाओं के जबड़े से छीन लिया था सपना
Mon, Dec 1, 2025
राजेश पटेल, जमालपुर।
इतिहास खुद लिखना होगा। वरना, आने वाली नस्लें हमें और हमारे पूर्वजों को याद नहीं रख पाएंगी। मिर्जापुर जनपद के चुनार तहसील में तमाम ऐसी विभूतियों ने जन्म लिया है, जिनके बारे में सुनने से प्रेरणा मिलती है। जीवन जीने का सलीका मालूम पड़ता है। गर्व की अनुभूति होती है।
आज बात जमालपुर विकास खंड के पिड़खिड़ गांव में 15 फरवरी 1926 को जन्मे बाबू प्रेम सिंह के बारे में। उनका जीवन जीने का तरीका अनुकरणीय रहा। साधारण परिवार से ताल्लुक रखते हुए भी खुद को खड़ा किया। सम्मान लायक बनाया। आदर्श जीवन के सिद्धांतों को आत्मसात किया। वैसे ही जिया भी। अब तो पिड़खिड़ से बनारस आना-जाना काफी आसान हो गया। आजादी के पहले न सड़क थी, न गंगा पर पुल। उस समय बनारस जाकर पढ़ना बहुत ही मुश्किल भरा काम था। इसके अलावा भी और बाधाएं थी, लेकिन प्रेम सिंह को कोई बाधा नहीं रोक सकी। उन्होंने बीएचयू से ग्रेजुएशन और एलएलबी की।
उनके विचार और कार्य में कोई अंतर नहीं था। तभी तो उनकी न जयंती है और न पुण्यतिथि। फिर भी याद करने को विवश हुआ। आपका जीवन संघर्ष एवं सामाजिक मूल्यों का मानदंड स्थापित करने के लिए समर्पित रहा। आप ग्राम पिड़खिड़, पोस्ट पिड़खिड़, तहसील चुनार, परगना भुइली, जिला मिर्जापुर उत्तर प्रदेश के मूल निवासी रहे। पिता विश्वनाथ सिंह ने पढ़ाई तो आठवीं तक ही की थी, लेकिन उर्दू भाषा पर उनकी अच्छी पकड़ रही।
प्राथमिक शिक्षा गांव की प्राथमिक पाठशाला से ग्रहण करने के बाद इंटरमीडिएट की पढ़ाई रामनगर वाराणसी से की। बीए एवं एलएलबी की शिक्षा बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से ग्रहण की। एलएलबी करने के बाद आपका विवाह ग्राम कांटा, तहसील चंदौली जिला वाराणसी (वर्तमान में चंदौली जिला) के चौधरी सहदेव सिंह एडवोकेट की सुपुत्री यशोदा देवी के साथ हुआ। एलएलबी करने के बाद आपने वाराणसी जिला कचहरी में वकालत शुरू की। शीघ्र ही आपका चयन मुंसिफ (पीसीएस जे) के पद पर हो गया।
आपने उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में बतौर न्यायाधीश काम किया। फरवरी 1984 में आप जनपद न्यायाधीश गाजीपुर से सेवानिवृत्त हुए। आपको पत्नी यशोदा देवी के माध्यम से चार पुत्र एवं एक पुत्री की प्राप्ति हुई। सन 1964 में आपकी पत्नी यशोदा देवी की देहावसान हो गया। इसके बाद बाबू प्रेम सिंह ने ही पांचों संतानों की परवरिश की। दूसरी शादी नहीं की। आप समाज को एवं अपने पुत्रों व पुत्री को सदैव शिक्षा के महत्व को बताते थे। कहते थे कि अपने संसाधनों को दिखावे और फिजूलखर्ची में व्यर्थ नहीं करना है।
इसी सिद्धांत के कारण वह सादा जीवन जीते थे। आप अंध विश्वास, पाखंड, दिखावा एवं मंदिर-मस्जिद से दूरी बनाकर रहते थे। आप ईवी रामासामी नायकर पेरियार की पुस्तकों को पढ़ते थे। शिक्षा एवं विज्ञान के प्रति आपकी प्रेरणा से आपके पुत्रों व पुत्री ने भी सफलता की ऊंचाइयों को हासिल किया। बड़े पुत्र मुक्तेश्वर नाथ सिंह (स्वर्गीय) अपर महाधिवक्ता उच्च न्यायालय इलाहाबाद के पद तक पहुंचे। इनके पुत्र अमित कुमार सिंह एडिशनल चीफ स्टैंडिल काउंसिल उच्च न्यायालय इलाहाबाद रह चुके हैं। आपकी पुत्री डॉ. नलिनी सिंह एमएस (गायकोलॉजी) जनपद मऊ में हैं। आपके दूसरे पुत्र अविमुक्तेश्वर नाथ सिंह ज्वाइंट डायरेक्टर प्राजीक्यूशन के पद से सेवानिवृत्त हुए और लखनऊ में निवास करते हैं। आपके तीसरे पुत्र शैलेश्वरनाथ सिंह जिला जज के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं और लखनऊ में ही रहते हैं। चौथे पुत्र डॉ. वृजेश्वरनाथ सिंह एमडी (मेडिसन) हैं। रांची में रहते हैं। जमालपुर के गौरव बाबू प्रेम सिंह ने 28 सितंबर 2019 को अंतिम सांस ली।