Wed 29 Jul 2026
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खरी-खरी : पिछड़ो, मत पढ़ो इसे, यदि तुम्हें सवर्णों की हरवाही ही करनी है

नवल किशोर कुमार

आदमी को इतिहास से सीखना ही चाहिए। लोग यह मानते भी हैं, लेकिन इस देश के ओबीसी कभी नहीं सीखते। वे पीढ़ी-दर-पीढ़ी गलतियां करते जाते हैं और इस बात का रोना राेते हैं कि वे पिछड़े हैं। बिहार में संपन्न हुआ विधानसभा चुनाव भी इसका प्रमाण है कि कैसे पिछड़ों और अति पिछड़ों के वोट से सबसे अधिक राजपूत जीत गए। विधानसभा में भूमिहारों और ब्राह्मणों की संख्या भी उनकी आबादी के अनुपात में कई गुणा अधिक है। कुछ लोगों को यह लगता होगा कि बिहार में मुख्यमंत्री एक कुर्मी है और पिछड़ों का राज है, लेकिन सच यह नहीं है। पिछले बीस सालों से बिहार के पिछड़े इसी भ्रम में जी रहे हैं। सच तो यह है कि पिछड़ों का राज कभी आया ही नहीं। लालू प्रसाद के दौर में भी नहीं। तब भी सत्ता की बागडोर सवर्णों के हाथ में रही। एक जगदेव प्रसाद हुए, जो निछक्का दल बनाने की बात करते थे, लेकिन इसकी बुनियाद क्या होगी, इसे लेकर उनके मन में भी अस्पष्टता ही थी। रही बात कर्पूरी ठाकुर की तो मेरे सामने 10 अक्टूबर, 1978 को ‘द इकोनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित एक खबर है।

इस खबर में यह बताया गया है कि प्रौढ़ शिक्षा योजना की शुरुआत करते हुए जयप्रकाश नारायण ने कर्पूरी ठाकुर के सामने ही यह कहा कि पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने जाति के सवाल को बेहतर तरीके से सुलझाया है। उनके मुताबिक, ज्योति बसु ने जातिवाद को खत्म करने की दिशा में कई महत्वपूर्ण पहल किए हैं। यह सब वे कर्पूरी ठाकुर के सामने कह रहे थे, जो कि उस समय बिहार के मुख्यमंत्री थे और इस कारण मुख्यमंत्री थे, क्योंकि उन्हें जयप्रकाश नारायण का आशीर्वाद प्राप्त था।

मैं सोच रहा हूं कि कर्पूरी ठाकुर उस वक्त क्या सोच रहे होंगे जब जयप्रकाश नारायण उपरोक्त बात कह रहे होंगे। क्या उन्हें उनकी बात से चोट नहीं पहुंची होगी कि कैसे जयप्रकाश नारायण ने पिछड़े वर्गों को आरक्षण देने के सवाल को उनके ही सामने खारिज कर दिया था। कर्पूरी ठाकुर तब कितने मजबूर रहे होंगे, इसका अनुमान लगाया जा सकता है। फिर तो आगे चलकर यह भी हुआ कि जनता पार्टी के ही एक धड़े ने विरोध किया और कर्पूरी ठाकुर को मुख्यमंत्री का पद छोड़ना पड़ा। यह तारीख थी 21 अप्रैल, 1979। कर्पूरी ठाकुर के मुकाबले रामसुंदर दास को खड़ा किया गया।

जिस दिन यह हुआ, उसके अगले दिन अखबार में कर्पूरी ठाकुर का बयान छपा था कि यदि नई सरकार में आरएसएस के लोग शामिल नहीं होंगे तो उनके समर्थक विधायक रामसुंदर दास सरकार को अपना समर्थन देने को तैयार हैं। हालांकि उनके इस बयान का कोई मतलब नहीं था, क्योंकि तब रामसुंदर दास ने मुख्यमंत्री और कैलाशपति मिश्र कैबिनेट मंत्री के पद की शपथ ले चुके थे। इसके पहले कर्पूरी ठाकुर के मंत्रिमंडल में भी कैलाशपति मिश्र कैबिनेट मंत्री थे।

दरअसल, इतिहास बताता है कि बिहार में पिछड़ों के आंदोलन की कोई विचारधारा नहीं रही, जैसा कि तमिलनाडु में गैर-ब्राह्मणवाद की रही। कर्पूरी ठाकुर को ब्राह्मणों की गुलामी से कोई परहेज नहीं था। उनके चेले लालू प्रसाद को भी नहीं रही है और नीतीश कुमार तो कर्पूरी ठाकुर का भी कान काटने वालों में हैं। नीतीश कुमार ऐसे बेगार बन चुके हैं जो सवर्णों के किसी बात का विरोध नहीं कर सकते। कर्पूरी ठाकुर और लालू प्रसाद में थोड़ी हिम्मत भी थी।

खैर, दो दिन पहले भागलपुर से एक शोधार्थी ने मुझे बताया कि वे शिवदयाल सिंह चौरसिया के जीवन व उनके कृत्य पर पीएचडी कर रहे हैं। अभी जब पिछड़े वर्गों के आंदोलन के बारे में सोच रहा हूं तो यह बात याद आई है। यह बात 1930 की है। लखनऊ के बेगम हज़रत महल पार्क में डिप्रेस्ड क्लास की एक रैली का आयोजन किया गया था। इसे डॉ. बी. आर. आंबेडकर संबोधित करने वाले थे। लेकिन कुछ ऐसा हुआ कि डॉ. आंबेडकर को बिना भाषण दिए वापस लौटना पड़ा था।

इस घटना की एक बड़ी वजह यह थी कि डॉ. आंबेडकर के लिए पिछड़े और दलित अलग-अलग थे। यह इसके बावजूद कि पिछड़ा समाज उन्हें अपना समर्थन दे रहा था। उनके आंदोलनों में शामिल हो रहा था। उत्तर प्रदेश के ही एक रामचरनलाल निषाद एडवोकेट थे, जो सूबे में शूद्र जातियों के लिए आंदोलन चला रहे थे। उनके सहयोगियों में रामप्रसाद अहीर, शिवदयाल चौरसिया, राजाराम कहार, बीएस जैसवार आदि नेता थे। ये सभी शूद्र जातियों के लिए समान व्यवस्था व अधिकार के पक्षधर थे, लेकिन डॉ. आंबेडकर को केवल अछूत जातियों से मतलब था। इतना ही नहीं जब लोथियन कमेटी यानी मताधिकार समिति का आगमन हुआ तो डॉ. आंबेडकर सिर्फ़ अछूत जातियों के दोहरे मताधिकार के पक्ष में प्रत्यावेदन दिए। इससे रामचरनलाल निषाद एडवोकेट को गहरा धक्का लगा। फिर तो जो हुआ वह इतिहास भी नहीं बताता। आंदोलन दम तोड़ चुका था। यह अलग बात है कि शिवदयाल चौरसिया संविधान सभा के सदस्य बने और बाद में काका कालेलकर आयोग के सदस्य भी।

कुल मिलाकर बात यह कि पिछड़े तब तक बेपेंदी का लोटा बने रहेंगे, जब तक उनके पास कोई विचारधारा नहीं होगी। लोहियावाद एक विचारधारा जरूर है, लेकिन इसमें भी खूब सारे छेद हैं। मुझे नहीं पता कि पेरियार की विचारधारा को बिहार के पिछड़े कब अपनी विचारधारा मानेंगे, लेकिन यह जरूर जानता हूं कि बिना पेरियारवाद के पिछड़ों की हालत कभी नहीं सुधरेगी। वे सवर्णों के गुलाम बने रहेंगे।

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